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“टाइम” मैगज़ीन के कवर पर किसान आंदोलन की महिलाएं, क्या लोग इसे देख रहे हैं?

by Khabartakmedia
  • टाइम मैगज़ीन के कवर पर किसान आंदोलन के महिलाओं की तस्वीरें।
  • किसान आंदोलन को पूरा हो चुका है सौ दिन।
  • राज्यों के विधानसभा चुनाव में व्यस्त हैं नेता और लोग।

भारत में चल रहे किसान आंदोलन को सौ दिन पूरे हो चुके हैं। किसान आंदोलन जिन मुद्दों के साथ शुरू हुआ था वो आज भी बने हुए हैं। केंद्र सरकार द्वारा लाई गई तीनों कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसान इसे वापस लेने की मांग पर डटे हुए हैं। किसानों की मांग है कि तीनों कृषि कानूनों को सरकार वापस ले ले। साथ ही किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की संवैधानिक गारंटी दी जाए। जिस तरह किसान अपनी मांगों पर डटे हुए हैं, ठीक उसी तरह केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अपने फैसले पर टिकी हुई है। सरकार की मंशा कतई तीनों कृषि कानून वापस लेने की नहीं है। सरकार लगातार इन कानूनों के फायदे गिनाने में लगी हुई है। हालांकि किसानों की मांग पर सटीकता से बात नहीं करती दिख रही है।

विश्व भर में लोकप्रिय टाइम पत्रिका के कवर पेज पर किसान आंदोलन को जगह मिली है। टाइम ने अपने कवर पर किसान आंदोलन की महिलाओं की एक तस्वीर छापी है। गौरतलब है इस आंदोलन में महिलाएं बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं। आंदोलन के शुरुआती दिनों से ही बड़ी संख्या में महिलाएं दिल्ली की सीमाओं पर बैठी हुई देखी गईं। जगह जगह लग रहे किसान पंचायतों में भी महिलाओं की मौजूदगी बड़ी तादाद में देखने को मिल रही है। हालांकि बीच के दिनों में महिलाओं और बूढ़ों के आंदोलन में शामिल होने पर काफी टीका टिप्पणी हुई थी। कई बार इन महिलाओं अलग अलग तरीकों से बदनाम करने की भी पुरजोर कोशिश की गई। शाहीनबाग में महिलाओं के नेतृत्व में चल रहे सीएए विरोधी आंदोलन से इसकी तुलना की गई। आरोप लगाया गया कि इन्हें पैसे देकर धरना दिलवाया जा रहा है। हालांकि तमाम बकैतियों के बावजूद किसान आंदोलन की महिलाएं मजबूती से डटी हुई हैं।

चुनाव और किसान आंदोलन:

ये सवाल बड़ा है कि क्या किसान आंदोलन को लेकर अब बातें कम हो रही हैं? क्या लोगों के बीच से किसान आंदोलन का सवाल मिटने लगा है? क्या लोग इसे खत्म समझ रहे हैं? जिस उत्सुकता के साथ महीने दिन पहले तक कृषि कानूनों और इस आंदोलन पर हर तरफ बात हो रही थी वो अब क्यों देखने को नहीं मिल रही है? आंदोलन के लंबा खींचने के कारण जनता के बीच से ये मुद्दा गायब नजर आ रहा है। केंद्र की भाजपा सरकार यही चाहती है?

भारत में अगले एक से दो महीने के भीतर पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुदुचेरी। राजनीतिक दलों का सारा ध्यान इन चुनावों पर लगा हुआ है। नेता इस जुगत में लगे हैं कि उन्हें इन चुनावों में जीत मिले। मीडिया में दिन रात इन राज्यों के सियासी समीकरणों पर ही बातें भी हो रही हैं। आम जनता के बीच भी यही मुद्दा गरमाया हुआ है। ऐसे में किसान आंदोलन ने अपने सौ दिन पूरे कर लिए हैं। किसान नेता राकेश टिकैत ने साफतौर पर यह बात कही है कि जब तक तीनों कृषि कानूनों को वापस नहीं लिया जाएगा, एमएसपी की संवैधानिक गारंटी नहीं दी जाएगी आंदोलन चलता रहेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर कब तक?

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