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मानदेय के बखेड़े ने अनुदेशकों की होली कर दी काली, आखिर क्यों?

by Khabartakmedia
Yogi Adityanath

होली के दिन एक जुमला खूब बोला जाता है “बुरा ना मानो होली है”। लेकिन इस जुमले को कहने का एक ख़ास संदर्भ होता है। ऐसा नहीं है कि होली के दिन कुछ अनाप शनाप काम हो जाए और कह दिया जाए कि बुरा ना मानो होली है। होली का त्योहार रंगों का त्योहार होता है। ये बात हर कोई जानता है। रंग कई तरह के होते हैं। एक रंग होता है काला। लेकिन होली के दिन कहीं भी काले रंग या गुलाल का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। क्योंकि ऐसी मान्यता है कि काला एक अशुभ रंग है। हालांकि राजनीतिक संदर्भ में काला प्रतिरोध का रंग होता है।

सोमवार को जब पूरा भारत रंग बिरंगी होली मना रहा था। तभी हजारों की संख्या में लोग ट्विटर और अन्य सोशल माध्यमों पर “काली होली” मना रहे थे। इनके होली का पकवान खट्टा हुए पड़ा था। क्योंकि सवाल कमाई का था। बीते कल ट्विटर पर हजारों लोगों ने #अनुदेशकों_की_काली_होली के हैशटैग के साथ ट्वीट किया। इनमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ केंद्रीय मंत्रियों और राज्य के मंत्रियों को टैग किया गया था। ट्वीट करने वाले लोग उत्तर प्रदेश के उच्च प्राथमिक विद्यालयों के अनुदेशक शिक्षक हैं। जो अपना मानदेय बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। मांग है कि अनुदेशक शिक्षकों की मानदेय बढ़ाकर दोगुनी की जाए।

क्या है अनुदेशकों के मानदेय का मुद्दा:

उत्तर प्रदेश में पिछली सरकार यानी कि अखिलेश यादव जब मुख्यमंत्री थे, तब उच्च प्राथमिक विद्यालयों में अनुदेशक शिक्षकों की भर्ती की गई। ये भर्ती उन विद्यालयों में हुई जहां पढ़ने वाले छात्र छात्राओं की संख्या सौ से अधिक थी। 2013 का साल था। नियुक्ति जब हुई तो अनुदेशकों की मानदेय 7000 रुपए प्रतिमाह तय की गई। इसके तीन साल बाद मानदेय में बढ़ोतरी हुई और ये 8470 रुपया हो गया। बता दें कि प्रदेश में अनुदेशक शिक्षकों की तादाद करीब तीस हजार है।

बढ़ती महंगाई के साथ मानदेय बढ़ाने की सुगबुगाहट होने लगी थी। 2017 का साल था, उत्तर प्रदेश में चुनाव हुआ। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को बड़ी बहुमत हासिल हुई। भाजपा की सरकार बनी और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनाए गए। अनुदेशकों के मानदेय को दोगुनी करने को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से एक प्रस्ताव केंद्र की भाजपा सरकार को भेजा गया। प्रस्ताव में अनुदेशकों की मानदेय 17000 रुपए करने की बात कही गई थी। केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। लेकिन अगले कुछ महीनों तक मानदेय बढ़ाकर अनुदेशकों को नहीं मिला।

ये मानदेय बढ़ने से पहले ही एक अवरोध पैदा हो गया। उत्तर प्रदेश के न्याय विभाग ने इस बढ़ोतरी पर आपत्ति जता दिया। जिसके बाद सब ठप हो गया। अनुदेशक शिक्षकों को 7000 रुपए ही मिलता रहा। अब कुछ अनुदेशकों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल हुई। अदालत में सुनवाई हुई। फैसला अनुदेशक शिक्षकों के पक्ष में आया। 3 जुलाई, 2019 को इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अनुदेशकों को 17000 रुपए मानदेय देने का आदेश दिया। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पर अमल नहीं किया।

उच्च न्यायालय से मामला पहुंचा सर्वोच्च न्यायालय:

उच्च न्यायालय का फैसला नहीं मानने पर एक बार फिर ये मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंच गया। अदालत में मुख्य सचिव राजेंद्र तिवारी पर अवमानना दाखिल किया गया। हालांकि इस मामले की सुनवाई के पहले ही उत्तर प्रदेश के स्कूली शिक्षा महानिदेशक ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्कूली शिक्षा महानिदेशक की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी।

तब से यह मामला कानूनी दांव पेंच में उलझा हुआ है। और एक के बाद एक अनुदेशकों का हर पर्व त्योहार काला हुए जा रहा है। अनुदेशकों की मांग पर कागज से बाहर कोई खास कदम नहीं उठाया जा रहा है। प्रदेश में मुद्दों की ऐसी भरमार है कि अनुदेशक उसमें कहीं खो गए हैं। हजारों ट्वीट्स के बाद भी किसी नेता पर कोई फर्क नहीं पड़ा। अनुदेशक शिक्षक अपने ही ट्वीट को रीट्वीट कर रहे हैं। एक ही हैशटैग को कई बार ट्वीट कर रहे हैं। ताकि उनका हैशटैग ट्रेंड में आ जाए और शायद सरकार उनकी बात सुन ले। ये “डिजिटल इंडिया” है। यहां अब हर काम डिजिटल होने की ओर है। लेकिन अनुदेशकों का मुद्दा गंभीर है। सरकार को कायदे से इस मामले पर कोई कदम उठानी चाहिए। ताकि अनुदेशकों की होली और अन्य तीज त्योहार काला ना हो।

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