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NSA बनी उत्तर प्रदेश सरकार की हथियार, 78 फीसदी मामलों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने किया रद्द!

by Khabartakmedia

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) किसी भी सरकार के लिए एक हथियार है। कानून बनाया तो गया था राष्ट्रीय सुरक्षा और लोक व्यवस्था के खिलाफ काम करने वाले लोगों के लिए। कहा तो जाता है कि देश की एकता में खलल ना पड़े, सुरक्षा कायम रहे इसलिए एनएसए बना है। लेकिन इतिहास इस बात की गवाही देता है कि हर अलोकतांत्रिक व्यवस्था को लोकतांत्रिक अमलीजामा ही पहनाया जाता है। लोकतांत्रिक मूल्यों को रौंदने के लिए लोकतंत्र की दुहाई ही दी जाती है। रासुका भी इसी श्रेणी में आता है। इसकी आलोचना हमेशा से होती रही है। लेकिन अब एक चौंका देने वाली रिपोर्ट सामने आई है। द इंडियन एक्सप्रेस ने इस खोजी रिपोर्ट को छापा है। जिसमें किस तरह उत्तर प्रदेश सरकार रासुका का गलत इस्तेमाल कर रही है, इस बात की कलई खुल जाती है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में जनवरी, 2018 से दिसंबर, 2020 तक के मामलों की पड़ताल की गई है। इस दौरान पुलिस द्वारा अलग अलग मामलों में आरोपी पर एनएसए लगाने के मामले और न्यायालय की सुनवाई को खंगाला गया है। रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी, 2018 से दिसंबर, 2020 के बीच 120 मामलों में एनएसए लगाने पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई। इनमें से कुल 94 मामलों में अदालत ने एनएसए रद्द करने और आरोपी को रिहा करने के आदेश दिए।

रिपोर्ट बताती है कि गौ हत्या के मामले में 41 एनएसए लगाए गए। सभी मामलों में आरोपी किसी न किसी अल्पसंख्यक समुदाय के थे। लेकिन ये मामले जब अदालत पहुंचे तो कुछ और ही निकल कर सामने आया। 41 में से 30 केसों में एनएसए हटाने के आदेश दिए गए और आरोपी को रिहा किया गया। इन मामलों में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि पुलिस आरोपी को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका नहीं देती है। साथ ही एनएसए का गलत इस्तेमाल किया जाता है ताकि आरोपी को जमानत ना मिल सके। न्यायालय ने जब एनएसए हटाने और आरोपी को रिहा करने के आदेश दिए तो उत्तर प्रदेश सरकार को जमकर लताड़ भी लगाई।

सांप्रदायिक मामलों में सभी एनएसए रद्द:

जनवरी, 2018 से लेकर दिसंबर, 2020 के बीच सांप्रदायिक मामलों में कुल 20 बार एनएसए लगाया गया है। लेकिन जब इसके खिलाफ लोगों ने इलाहबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की तो सभी के सभी मामलों से एनएसए हटाने का फैसला दिया गया। यानी कि 20 में से 20 मामलों में पुलिस ने गलत तरीके से एनएसए को अपना हथियार बनाया। सभी मामलों में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सरकार और पुलिस को कोसा है।

इसके अलावा कुल 25 राजनीतिक मामलों में और 34 अन्य मामलों में भी एनएसए का इस्तेमाल हुआ। राजनीतिक मामलों में 25 में से 20 बार और अन्य में 34 में से 24 बार अदालत ने एनएसए रद्द करने का फैसला सुनाया। देखा जाए तो कुल 78 फीसदी मामलों में पुलिस ने बेबुनियादी तरीके से एनएसए जैसी ख़तरनाक और गंभीर कानून का इस्तेमाल किया। 78 फीसदी मामलों में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एनएसए हटाने का आदेश दिया और आरोपी को रिहा किया गया।

गौरतलब है कि एनएसए जैसी कानूनों का इस्तेमाल गलत इरादों से किया जा रहा है। राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए और अन्य कारणों से यह सब किया जा रहा है। हालांकि इस रिपोर्ट के आने के बाद क्या सरकार और पुलिस इस हरकत से दूरी बनाएगी? कहा नहीं जा सकता है। लेकिन यह रिपोर्ट इतना तो साफ कर ही देती है कि एनएसए और UAPA जैसे कठोर कानूनों का इस्तेमाल लोगों को ज्यादातर फंसाने और उन्हें दबाने की मंशा से की जाती है।

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