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बस्तर में आदिवासी आंदोलन पर चौतरफा चुप्पी, समझिए पूरा सेलगर प्रकरण

by Khabartakmedia
bastar

Bastar Adivasi Protest, Chhattisgarh. छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में पिछले कुछ दिनों से एक आंदोलन चल रहा है। इलाके के आदिवासी प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शन सुकमा जिले के सेलगर में लगे नए सीआरपीएफ कैंप के विरोध में हो रहा है। लगभग दो हफ्तों से आदिवासियों का प्रदर्शन चल रहा है। लेकिन इस बीच 17 मई को प्रदर्शनकारियों और सीआरपीएफ के बीच झड़प हो गई।

इस झड़प ने गोलीबारी का रूप अख्तियार कर लिया। मीडिया रपटों के 17 मई के दिन आंदोलन कर रहे आदिवासियों को तितर बितर करने के लिए सीआरपीएफ के जवानों ने लाठीचार्ज किया। आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद सीआरपीएफ ने गोलीबारी भी की। इसी दौरान कथित तौर पर सीआरपीएफ की गोली से तीन आदिवासियों की मौत हो गई। जबकि लगभग दो दर्जन आदिवासी घायल हो गए। इसके बाद एक दर्जन आदिवासियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।

राज्य सरकार ने बनाई समिति:

कथित तौर पर सीआरपीएफ की गोली से तीन लोगों की मौत 17 मई को हुई थी। इस पर आदिवासी हितों की आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कार्रवाई की मांग शुरू की। छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सवालों के घेरे में थे। ट्विटर पर पिछले कई दिनों से इसके लिए हैशटैग ट्रेंड कराए जा रहे हैं। हालांकि मुख्य धारा की मीडिया ने इस खबर को बिल्कुल भी जगह नहीं दी।

यही वजह रही कि छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार भी दबाव में नहीं थी। लेकिन मंगलवार यानी आज सरकार ने एक समिति का गठन किया है। बस्तर के सांसद दीपक बैज की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय समिति का गठन हुआ है। इसमें सभी सदस्य जनप्रतिनिधि हैं। कहा गया है कि यह समिति स्थानीय लोगों से चर्चा करेगी। तथ्य जुटाएगी। छत्तीसगढ़ सरकार ने कहा है कि समिति के साथ प्रशासनिक अधिकारी भी रहेंगे।

अब पहला सवाल यहीं उठता है कि सिर्फ समिति बनाने में लगभग दो हफ्तों का समय क्यों लग गया? क्या इस वजह से कि मुख्यधारा के अख़बारों और टीवी न्यूज चैनलों ने इस खबर को नहीं दिखाया? क्या इस वजह से कि ट्विटर पर इस घटना के विरोध में कोई हैशटैग नंबर एक पर ट्रेंड नहीं हुआ? या फिर आदिवासियों को सरकार महत्व नहीं देती? या फिर आदिवासियों की जिंदगी सरकार की प्राथमिकता में नहीं है?

भूपेश बघेल का दोहरा रवैया:

छत्तीसगढ़ से कुछ दिनों पहले एक वीडियो वायरल हुआ। वीडियो प्रदेश के सूरजपुर जिले का था। सूरजपुर जिले के कलेक्टर ने तालाबंदी के बीच दवाई खरीदने निकले एक युवक की पिटाई कर दी। तमतमाए कलेक्टर ने उस लड़के का फोन भी सड़क पर पटक दिया। ट्विटर पर वीडियो वायरल हो गया। कलेक्टर के खिलाफ आवाज उठने लगी। महज 24 घंटों के भीतर राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मामले का संज्ञान लिया। उन्होंने सूरजपुर के कलेक्टर को बर्खास्त कर दिया। पीड़ित लड़के को एक नया फोन भी सरकार के तरफ से दी गई।

इस सजगता के लिए सीएम भूपेश बघेल की खूब तारीफ हुई। लेकिन 3 लोग निर्ममता से गोली मार दिए गए लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 24 घंटे के भीतर न्यायिक जांच के आदेश तक नहीं दिए। जनप्रतिनिधियों की एक समिति बनाने में भूपेश बघेल सरकार को लगभग दो हफ्ते का समय लग गया! क्या सिर्फ इसलिए कि सूरजपुर के मामले में दिल्ली के कुछ बड़े पत्रकारों ने ट्वीट किया था? जबकि सेलगर के मामले में ज्यादातर ने चुप्पी साध रखी है?

विपक्ष की चुप्पी, ट्विटर पर संघर्ष:

छत्तीसगढ़ का हर राजनीतिक मसला बेहद अजीब मोड़ पर खड़ा होता है। दरअसल हर वो राज्य जहां कांग्रेस की सरकार है, वहां हर नेता की पोल पट्टी खुलने लगती है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है। जबकि विपक्ष में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) है। जबकि केंद्र में भाजपा की सरकार है और कांग्रेस विपक्षी दल है। यही वो गुत्थी है जो एक साथ कांग्रेस और भाजपा दोनों को उलझा देती है।

सेलगर में हुए गोलीकांड पर छत्तीसगढ़ की विपक्षी पार्टी भाजपा ने चुप्पी साध रखी है। पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता डॉ. रमन सिंह ने इस मसले पर अब तक कोई ट्वीट नहीं किया है। राजनीतिक खानापूर्ति के लिए भी उन्होंने इस मुद्दे को स्पर्श नहीं किया है। पिछले छत्तीसगढ़ चुनाव में कांग्रेस ने बस्तर के 12 में से 11 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। इसकी वजह बताई गई कि बस्तर के इलाके के लोग भाजपा की आदिवासी विरोधी नीतियों से तंग हो चुके थे। जबकि कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में आदिवासी हितों के रक्षा की बात कही थी।

हालांकि कांग्रेस ने लगातार इस इलाके के लोगों को मायूस किया है। इन इलाकों में अभी भी जंगलों का सफाया हो रहा है। खनन के लिए उद्योगपतियों के हाथों सौदा किया जा रहा है। जंगल का सफाया करके लगातार फौजी कैंप लगाए जा रहे हैं। आदिवासियों को सबसे ज्यादा डर इन्हीं कैंपों का है। नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच आदिवासियों का जीवन त्रस्त होते आ रहा है। एक तरफ नक्सली आदिवासियों को अपने साथ मिलाने के लिए मारते हैं। नक्सली आदिवासी लोगों को सुरक्षा बलों का साथ देने के लिए जीना मुश्किल कर देते हैं।

दूसरी ओर सुरक्षा बलों से भी आदिवासियों को कम खतरा नहीं है। आए दिन आदिवासी सुरक्षा बलों के शक के शिकार होते रहते हैं। नक्सलियों का साथ देने के शक में इन्हें सजा भुगतना पड़ता है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब सुरक्षा बलों ने किसी आम आदिवासी को माओवादी समझकर मार दिया। ये घटनाएं आदिवासियों के जीवन का हिस्सा हो चुकी हैं। लेकिन मुख्यधारा में इन समस्याओं पर ना के बराबर ही बहस होती दिखती है। क्या राजनीतिक दल, क्या मीडिया और क्या आम जनता! हर कोई इस मुद्दे से मुंह मोड़ दिखता है।

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