Latest News
Home ताजा खबर भ्रमित ना हों: बेसिक शिक्षा विभाग ने बताया, पंचायत चुनावों में हुई कुल 3 शिक्षकों की मौत!

भ्रमित ना हों: बेसिक शिक्षा विभाग ने बताया, पंचायत चुनावों में हुई कुल 3 शिक्षकों की मौत!

by Khabartakmedia

उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग की ओर 18 मई, 2021 को एक प्रेस नोट जारी की गई। जिसमें इस साल हुए उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव के दौरान जान गंवाने वाले शिक्षकों की जानकारी दी गई है। इस विज्ञप्ति में बेसिक शिक्षा विभाग ने राज्य निर्वाचन आयोग के गाइडलाइन को भी स्पष्ट किया है। गाइडलाइन ये कि किस आधार पर किसी शिक्षक की मौत को चुनाव के दौरान हुई मृत्यु मानी जाएगी। इसी गाइडलाइन के अनुसार पूरे उप में हुए शिक्षकों की मौत की गिनती होगी। फिर उनके परिजनों को अनुग्रह राशि दी जाएगी।

बेसिक शिक्षा विभाग ने 18 मई को जारी किए अपने प्रेस नोट से हर किसी को चौंका दिया है। बेसिक शिक्षा के अनुसार उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव-2021 के दौरान कुल तीन शिक्षकों की मौत हुई है। यानी कि चुनाव की ड्यूटी में लगे तीन ही शिक्षकों ने अपनी जान गंवाई है। ये संख्या विभिन्न जिलों के जिलाधिकारियों ने अब तक राज्य निर्वाचन आयोग को भेजा है।

क्या है शिक्षक संघ का दावा:

उत्तर प्रदेश शिक्षक संघ के द्वारा पिछले दिनों एक सूची जारी की गई थी। जिसमें शिक्षक संघ ने पंचायत चुनावों में 1621 शिक्षकों के मरने की बात कही थी। शिक्षक संघ ने सभी 1621 शिक्षकों के नाम और अन्य जानकारियां भी दी थी। संघ ने राज्य सरकार भी मांग की थी कि पंचायत चुनावों में जान गंवाने वाले शिक्षकों एक एक करोड़ रुपए की मुआवजा राशि दी जाए।

अब उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा विभाग ने 1621 के बजाए सिर्फ 3 शिक्षकों की मृत्यु को मान्यता दी है। साथ ही राज्य सरकार ने पंचायत चुनाव की ड्यूटी के दौरान मरने वाले शिक्षकों 30 लाख रुपए की मुआवजा देने की घोषणा की है। बेसिक शिक्षा विभाग के इस हालिया प्रेस नोट पर खूब बहस छिड़ी हुई है। शिक्षकों और सरकार के बीच खींचतान चल रही है। इस मामले पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी आज ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा है कि “पंचायत चुनाव में ड्यूटी करते हुए मारे गए 1621 शिक्षकों की उप्र शिक्षक संघ द्वारा जारी लिस्ट को संवेदनहीन यूपी सरकार झूठ कहकर मृत शिक्षकों की संख्या मात्र 3 बता रही है। शिक्षकों को जीते जी उचित सुरक्षा उपकरण और इलाज नहीं मिला और अब मृत्यु के बाद सरकार उनका सम्मान भी छीन रही है।”

क्या है निर्वाचन आयोग का तर्क:

बेसिक शिक्षा विभाग ने अपने प्रेस नोट राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा जारी गाइडलाइन का जिक्र किया है। इसमें बताया गया है कि जिनकी मौत “निर्वाचन अवधि” के दौरान होगी, उसे ही मान्यता दी जाएगी। अब ऐसे में सवाल है कि राज्य निर्वाचन आयोग “निर्वाचन अवधि” किसे मानता है। मतदान/मतगणना संबंधी प्रशिक्षण एवं मतदान/मतगणना कार्य हेतु कर्मचारी के निवास स्थान से ड्यूटी स्थल तक पहुंचने तथा ड्यूटी समाप्त कर उसके निवास स्थान तक पहुंचने को ही निर्वाचन अवधि मानी जाती है। इस निर्वाचन अवधि में किसी भी कारण से हुई मृत्यु की दशा में अनुग्रह राशि अनुमन्य है। जिसका निर्धारण राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाता है।

कोरोना की स्थिति को नजरंदाज कर रही है आयोग:

अब कोरोना महामारी की स्थिति में राज्य निर्वाचन आयोग को एक सवाल जवाब देना चाहिए। यदि “निर्वाचन अवधि” के दौरान कोई शिक्षक कोरोना संक्रमित हो जाए और फिर कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो जाए तो इसका जिम्मेवार कौन हुआ? अर्थात् एक शिक्षक जब घर से चुनाव के काम से अपने निवास स्थान से निकला तो “निर्वाचन अवधि” शुरू हो गई। इसी दौरान उसे किसी वजह से कोरोना का संक्रमण हो गया। फिर वो अपने घर लौटा। घर पहुंचने के बाद “निर्वाचन अवधि” समाप्त हो गई। इसके बाद उसकी मृत्यु हो गई। तो इस मौत को क्या माना जाए?

निर्वाचन आयोग की गाइडलाइन इसे चुनाव के दौरान हुई मौत की मान्यता नहीं देती है। लेकिन जिस कोरोना संक्रमण से शिक्षक की मौत हुई, वो संक्रमण निर्वाचन अवधि के दौरान ही हुई है। जाहिर है कि राज्य निर्वाचन आयोग और बेसिक शिक्षा विभाग शब्द जाल में लोगों को उलझा रहा है। पहले राज्य सरकार और चुनाव आयोग ने मिलकर शिक्षकों को भयानक महामारी के दौर में पंचायत चुनाव में झोंक दिया। शिक्षक संघ के आंकड़े अगर सही हैं तो 1600 शिक्षक राज्य सरकार और निर्वाचन की जिद के चलते मर गए। उनके घर उजड़ गए। लेकिन अब उनकी मौत को मान्यता तक नहीं दी जा रही। मुआवजा तो अभी बहुत दूर की कौड़ी है।

Related Articles

Leave a Comment