Latest News
Home विशेष मंजूर एहतेशाम: पाक रमजान महीने में यूँ चले जाना!

मंजूर एहतेशाम: पाक रमजान महीने में यूँ चले जाना!

by Khabartakmedia

खबर तक के लिए निरंजन सहाय

इस साल दहशत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। उदास मौसमों के इस कोरोना काल ने एक और बेहतरीन कथाकार मंजूर एहतेशाम को हमसे छीन लिया। अपने ख़ास अंदाज़ेबयां के लिए मशहूर मंजूर एहतेशाम ने 1973 में एक कहानी लिखी थी –‘रमजान में मौत’। संयोग ऐसा कि इस फानी दुनिया से जाने के लिए उनका वक्त मुकर्रर हुआ पाक रमजान का महीना ही। दस दिन पहले ही कोविड संक्रमण के चलते उन्हें भोपाल के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। तिहत्तर साल की उम्र में 25 अप्रैल को आधी रात के आसपास उन्होंने शहर के पारुल अस्पताल में अंतिम सांस ली।

पद्मश्री कथाकार मंजूर एहतेशाम का जन्म 3 अप्रैल, 1948 को अदब और अदीबों के खुबसूरत शहर भोपाल में हुआ था। खानदान के लोगों की चाहत थी, वे इंजीनियर बनें, लेकिन अपनी तबीयत के मालिक मंजूर ने अपने दिलो-दिमाग में लेखक बनने का सपना संजोया था। लिहाजा वही हुआ जो होना चाहिए, इंजीनियरिंग की पढ़ाई अधूरी छूट गई। जीने के लिए कोई आर्थिक सहारा तो चाहिए था लिहाजा कुछ दिन व्यवसाय में उन्होंने अपनी किस्मत आजमायी। लेकिन उनके जज्बात उनकी कलम के मार्फ़त जिंदगी के हर मोड़ पर लब्जों में ढलते रहे।

उनकी पहली कहानी ‘रमज़ान में मौत’ साल 1973 में छपी, तो पहला उपन्यास ‘कुछ दिन और’ साल 1976 में प्रकाशित हुआ। इसके अलावा सूखा बरगद, दास्ताने लापता, बशारत मंजिल, पहर ढलते उनके प्रमुख उपन्यास हैं। वहीं तसबीह, तमाशा जैसी कई कहानियों की रचना उन्होंने की है। उनकी कलम ने समाज की रूढ़ियों-अंधविश्वासों, अन्याय और बुराइयों के ख़िलाफ़ हमेशा मोर्चा लिया। अपने लेखन में मंजूर एहतेशाम ने भारतीय मुसलमानों की दुनिया का जो विश्वसनीय खाका खींचा है वह अपनी प्रभावधर्मिता में अन्यतम है। इस लिहाज से उनके उपन्यास ‘सूखा बरगद’ को ख़ास तौर पर याद किया जा सकता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि यह उपन्यास, महज़ उपन्यास ही नहीं, भारतीय मुस्लिम समाज की मुकम्मल तस्वीर भी है।

मौजूदा मुस्लिम समाज के अन्तर्विरोधों की गम्भीर और विश्वसनीय पड़ताल में यह रचना कला मूल्यों के निर्वाह और घटनाओं के संजीदा वर्णन के कारण यह रचना देश और काल की सीमा को लाँघते नज़र आती है। मंजूर एहतेशाम की रचनाओं से गुजरते हुए पाठक उन्हें राही मासूम राजा और शानी की रवायत की अगली कड़ी के रूप में पाते हैं। उन्होंने ‘सूखा बरगद’ में मुस्लिम-समाज के विकास से जुड़े जिन संवेदनशील गतिरोधों को विश्वसनीय ढंग से उकेरा है उनकी चर्चा से भी आमतौर पर लोग घबराते हैं।

धर्म, जातीयता, क्षेत्रीयता, भाषा और साम्प्रदायिकता के जो सवाल, आज़ादी के बाद मुल्क में पैदा हुए हैं, उनकी असहनीय और तकलीफदेह आँच इस रचना में शिद्दत से मौजूद है। ये सवाल ‘सूखा बरगद’ की झूलती हुई जड़ों की मानिन्द फैले हुए हैं जिसके नीचे न तो कोई कौम पनप सकता है और न खुशहाली की उम्मीद से नाता जोड़ा जा सकता है।

इसी तरह अपने बहुचर्चित उपन्यासों ‘दास्तान-ए-लापता’ और ‘मदरसा’ के माध्यम से उन्होंने यथार्थ के अनछुए पहलुओं को जिस किस्सागोई से पेश किया उसने भारतीय मुस्लिम मन की अनेक जटिलताओं का भरोसेमंद आख्यान पेश किया। ‘दास्तान-ए-लापता’ का अमेरिका के एक प्रोफेसर ने अंग्रेजी में अनुवाद भी किया, जो ‘स्टोरी आफ मिसिंग मैन’ नाम से छपा। उनकी अन्य रचनाओं में-कुछ दिन और, बशारत मंज़िल, पहर ढलते जैसे उपन्यास तथा रमजान में मौत, तस्वीह, तमाशा जैसी कहानियों को हम याद कर सकते हैं। बेहतरीन रचनाधर्मिता के लिए उन्हें अनेक सम्मानों से नवाजा गया, जिनमें श्रीकांत वर्मा स्मृति सम्मान, भारतीय भाषा पुरस्कार, वीर सिंह देव पुरस्कार,पहल सम्मान तथा पद्मश्री जैसे उल्लेखनीय सम्मान शामिल हैं।

भारत की बहुभाषिक दुनिया के अद्भुत बाशिंदे एहतेशाम हिंदी, इंग्लिश और उर्दू भाषा के माहिर जानकार थे। स्थानीयता या देशज रंग को काल सत्य में रूपान्तरित करने वाले हिन्दी के बेमिसाल रचनाकार मंजूर एहतेशाम का जाना साहित्य जगह के साथ पूरे समाज के लिए गहरी क्षति है।

(प्रो.निरंजन सहाय महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में हिन्दी के प्रोफ़ेसर और नोडल ऑफिसर यूजीसी के रूप में कार्यरत हैं। हिन्दी की अधिकाँश प्रतिष्ठित पत्र/पत्रिकाओं में प्रो. सहाय के नियमित लेखन प्रकाशित होते रहते हैं।)

Related Articles

Leave a Comment