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काशी विद्यापीठ: चचा की चाय में मुस्कुराते हैं बापू

by Khabartakmedia

स्वभावत: बापू हॅंसमुख थे। वर्तमान पीढ़ी के समक्ष बापू की काया नहीं है। परंतु उनकी छायारुपी मोहनी मुस्कान जीवंत है। काशी विद्यापीठ में दो जगह हॅंसमुख बापू का दिग्दर्शन होता है। पहला पंत प्रशासनिक चौराहे पर स्थापित स्मारक में और दूसरा चचा की चाय में। हम बात कर रहे हैं नींबू के चायवाले चचा बृजलाल की

चचा बृजलाल साधरण से चायवाले हैं। चचा व्यक्ति साधारण है, परंतु इनका चाय असाधारण है। चचा एक हाथ में टोटीदार पीतल की केतली और दूसरे हाथ में छाले की टंगन वाली टोकरी लेकर परिसर फेरी करते हैं। एक छोर फाइन आर्ट्स डिपार्टमेंट से लेकर दूसरे छोर गांधीयन स्टडीज चेयर तक अविराम परिक्रमा करते हैं। यह सिलसिला सुबह आठ बजे शुरू होता है और शाम पांच बजे तक चलता है।

चचा गरम-चाय गरम-चाय आवाज नहीं लगाते है। चचा को जहां चार लोग इकठ्ठा दिख जाते है। वहां चचा रुक जाते हैं। अपने मधुरिम मुस्कान से लोगों का ध्यान खींच लेते हैं।
चचा के मुस्कुराने मात्र से लोगो में चाय का चस्का उमड़ जाता है। विद्यापीठ का हर विभाग चचा के नींबू चाय का दीवाना है। प्रोफेसर्स, स्टूडेंट्स के दिनचर्या में चचा का तीन-चार कुल्हड़ चाय घुला हुआ है। चचा का चाय माइंड को रिलीफ देता है। टेंशन फ्री करता है। एक वाकया है। दो वर्ष पूर्व की।
छात्र कल्याण संकाय में एजुकेशनल टूर के लिए रेलवे रिजर्वेशन का फार्म भर रहे थे। मेरे साथ चार क्लासमेट्स व मार्गदर्शक के रुप में एक रिसर्च स्कॉलर थे। मुझसे फार्म में त्रुटि हो गई।
फार्म एक ही बार मिलता है। ऐसा रुल है। मैं तनाव से घिर गया। अब क्या होगा? अब तो डायरेक्टर सर से डांट पक्की है। मै आंतरिक असमंजस में था। मेरे सहपाठी को चचा दिख गए। वो चचा को बुला ली। बोली, भईया चलिए चाय पीते है। हम सब लोग चाय पीने के लिए उठकर बाहर आते हैं। पांच चाय कुल्हड़ का आर्डर देते हैं। कुल्हड़ मेरे होंठों को छूता है। सरस चाय जिव्हा रस में घुल जाता है। मन विचारों से भर जाता है।
चलो, जो होगा देखा जाएगा। चाय की चुस्की के साथ बतकही शुरू हुई। इसके बाद मैं भूल गया कि मुझसे कोई गंभीर त्रुटि हुई है। ऐसा नहीं था कि कैम्पस में चचा की चाय पहली दफा पीया था। हां, यह कह सकते हैं कि पहली बार चचा के चाय को अनुभव किया था। 2015 से चचा के चाय का रसिक हूं। इसके पहले चाय नहीं पीता था। चाय को बुरी लत समझता था।

वस्तुत: मुझे चाय से चिढ़ थी। काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठ्यक्रम में प्रवेश के बाद स्टूडेंट पॉलिटिक्स में रुचि में बढ़ गई। जगजाहिर है जर्नलिज्म और पॉलिटिक्स चाय के बिना अधूरा है। यही से मेरे सिर पर चाय का नशा चढ़ गया।
जो बरकरार है। जब मुझसे कोई पूछता है भाई तू कौन सा नशा करता है? मै सधे शब्दों में कहता हूं बस चचा का नींबू वाला चाय पीता हूं। अमूमन ऐसा माना जाता है कि छात्राएं कैम्पस में चाय नहीं पीती है। लेकिन मेरे कैम्पस में ऐसा नहीं है।
चचा के चाय का छात्र से ज्यादा छात्राएं लुत्फ उठाती है।

अगर किसी ग्रुप में छात्र-छात्रा साथ हैं तो छात्र से पहले छात्रा अपने हाथ को अपडाउन कर चचा को रोकती है। शौक से चुस्की लेती है। चचा के चाय में गजब का रस्क है।
चचा को देखते ही कंजूस से कंजूस लड़कियां अपना पर्स टटोलने लगती हैं। हर मौसम-हर मन में चचा के चाय का चस्का समान है। चचा बापू के मूल्य को जीते है। चचा असल स्वच्छता दूत हैं। किसी को कुल्हड़ बीच रास्ते में फेंकने नहीं देते हैं।
जो फेंक देता है, उससे सहज नाराजगी व्यक्त करते हैं। उससे फौरन कुल्हड़ उठवाकर डस्टबिन में डलवाते हैं। अगर व्यक्ति ज्यादा उदंड है तो खुद ही कुल्हड़ उठाकर कूड़ेदान के हवाले कर देते हैं। एक दिन की बात है। घड़ी में चार बज रहे थे।
सेंट्रल लाईब्रेरी में दो चार छात्र ही शेष थे।
मैं शांत वातावरण में मनन कर रहा था। तभी मेरा ध्यान एकाएक चचा पर पड़ गया। चचा लाइब्रेरी के मेज- खिड़की पर पड़े कुल्हड़ को बटोर रहे थे। मैं सशंकित हो गया। कहीं ये चाय वाला हम लोगों को झूठे कुल्हड़ में चाय तो नहीं पिलाता है?
मैं चुपचाप चचा की गतिविधियों को देखता रहा। जब चचा सारे कुल्हड़ बटोर कर सीढ़ी की ओर बढ़े तो मैं भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। आगे मैं जो देखा वह अकल्पनीय था। चचा जूठे कुल्हड़ कूड़ेदान को सौंप देते हैं। उस दिन कुल्हड़ के चट-सी आवाज से मेरा भ्रम भरभरा गया। खुद पर मुझे ग्लानी होने लगी। मैं कितना बुरा हूं कि नेक इंसान पर भी शक करता हूं? इस साधारण से व्यक्ति ने मेरा नजरिया बदल दिया। तब से मेरी नज़र में चचा की इज्जत बढ़ गई। मेरे दिल में चचा की चाय बैठ गई। चचा का काली चाय चुनावी रंग बदलने में माहिर है। समीकरण बना देता है। प्रत्याशी छात्रों को चचा का चाय पिलाकर सहजता से अपने पक्ष में माहौल खड़ा कर लेते हैं। चुनावी माहौल में चचा का चाय पीने के बाद नये-पुराने छात्रों को कैम्पस में छात्रसंघ की प्रासंगिकता महसूस होती है।

चुनाव रुचिकर हो जाता है। छात्र प्रत्याशी से जुड़ जाते हैं। चाय पीने वाले छात्र पाला नहीं बदलते हैं। प्रचार में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। पूरी निष्ठा से अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं। अन्ततः चचा का चाय पिज्जा बर्गर बीयर मुर्गा मेकअप आदि लॉलीपाप पर भारी पड़ता है। यही नहीं चुनावी सरगर्मी में प्रत्याशियों के प्रतिद्वंद के बीच चचा का चाय सद्भाव भी घोलता है।
एक मजेदार वाकया है। चुनाव तिथि घोषणा के बाद दो अजीज दोस्त अपने-अपने पसंद के प्रत्याशी को लेकर आमने-सामने हो गए। समर्थक दो गुटों में बंट गए। गौरतलब हो कि पूर्व में एक-दूसरे के समर्थन से दोनों दोस्त क्रमशः छात्रसंघ में उपाध्यक्ष रह चुके थे। जैसे ही चुनाव नजदीक आएं। दोनो‌ गुटों में तल्खी बढ़ गई।
एक सुबह प्रचार के दौरान नोंकझोंक हाथापाई भी हो गई। मेरा संबंध दोनों गुटों से मधुर था। अभी भी है। मैं एक गुट के लोगों के साथ चचा का चाय पीते हुए चर्चा कर रहे था। इसी बीच दूसरे गुट के कुछ लोग भी आ गए । बिना कहे चचा उन्हें भी चाय भरा कुल्हड़ थमा दिए। आपसी प्रतिद्वंदता के चलते चर्चा थम जाती है। चुस्की शुरु हो जाती है। बाद में आए लोगों की चुस्की पहले पूरी हो जाती है। उन्हीं में से एक भाई चाय का पेमेंट कर देता है। पहले से जमे प्रतिद्वंद्वी गुट के लोग पेमेंट के लिए मना करते हैं। कहते हैं रुको हम दे रहे हैं न पैसा। दूसरे गुट के लोग कहते हैं तुम सब मेरे भाई हो। हम सब एक हैं बस कैंडिडेट अलग-अलग है। कुछ यूं सुबह की तल्खी ढलते दोपहर के साथ ढल गई। पारस्परिक सद्भाव उमड़ आएं। रिश्ते में बनी दरारें चंद घंटों में भर गई। आपसी सौहार्द की रौनक छा गई। यह चचा के नीबू चाय का कमाल था। अगर कोई दो चार रुपये कम भी देता है तो चचा मुस्कुराकर रख लेते हैं। झंझट नहीं करते हैं। कहते हैं चला कल दे दिहा, हम त रोजे आईला। कैम्पस में चचा से कोई दुर्व्यवहार नहीं करता है। ओहदेदार प्रोफेसर व रसूखदार छात्रनेता भी आदर से चचा ही बोलते हैं। एक बार ज्ञान-विज्ञान पार्क में टिक टॉक वीडियो बनाने में मशगूल एक छात्र का पैर चचा की केतली से सट गया है। स्वाभाविक है चाय गरम है तो जलेगा ही। टिक टॉक में रमा छात्र अपनी गलती चचा पर मढ़ा दिया। उनपर उखड़ गया। गाली-गलौच करने लगा। चचा उलझे नहीं है। पार्क में मौजूद अन्य लोग बीच बचाव के लिए आते हैं। इससे पहले चचा सहजता से बोले बाबू चाय गरम है पी लो। दिमाग को शांति मिलेगी। तब वीडियो अच्छा बनेगा।

इसदिन चचा की विनम्रता से विवाद टल गया। इस वाकया के बाद मेरे जेहन में एक बात आई। जो आपसे साझा कर रहे हैं। इस दिन से मुझे चचा के चाय में मुस्कुराते हुए बापू की छवि का दिग्दर्शन होने लगा।
तब से मैं चचा को देखते ही सोचने लगता हूं चचा कम पढे़-लिखे व्यक्ति जरुर है परंतु बापू के सच्चे अनुयायी है। बापू के प्रिय मूल्य सत्य अहिंसा शांति सद्भाव स्वच्छता को निष्ठा से जी रहे है। राष्ट्र रत्न बाबू शिवप्रसाद की बगिया में बापू की प्रेरणा से बंधे मूल्यडोर सहारे जीविका की गाड़ी खींच रहे हैं।
विश्वविद्यालय प्रशासन को चचा को भी विश्वविद्यालय परिवार की पंक्ति की अंतिम में खड़ा करना चाहिए।
अर्थात विश्वविद्यालय विवरणिका में चचा का जिक्र अंतिम व्यक्ति के रुप में करनी चाहिए।

हर्ष का विषय है कि काशी विद्यापीठ शताब्दी वर्ष मना रहा है। अग्रिम पंक्ति के हर यशस्वी व्यक्तित्व का यशगान हो रहा है। यह जरुरी भी है। मेरा निजी मत है कि सौ वर्ष पूरे कर चुके गौरवशाली परिवार की पंक्ति में अग्रिम खड़े यशस्वी व्यक्ति से अंतिम में खड़े व्यक्ति का परिचय होना चाहिए। क्योंकि गौरवशाली परिवार की पंक्ति में खड़ा हर व्यक्ति बापू की परम्परा को आगे बढ़ा रहा है। कोई बापू को निजी जिंदगी में जी रहा है तो कोई बापू के सपनों के समाज को ढालने में जुटा है। मेरी दृष्टि में शतायु काशी विद्यापीठ परिवार की गौरवशाली पंक्ति का गौरव अंतिम व्यक्ति भी है।

लेखक: रजनीश हिन्द हिन्दी

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