Latest News
Home प्रादेशिक खबरेंकश्मीर कश्मीरी पंडितों के लिए तीन रक्तरंजित दिन, आज दूसरा दिन है!

कश्मीरी पंडितों के लिए तीन रक्तरंजित दिन, आज दूसरा दिन है!

by Khabartakmedia

कश्मीर, जो कभी महत्मा गांधी के उम्मीद की किरण थी। भारत की धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का जीता-जागता उदाहरण था। आजादी के बाद जब पूरे देश में दंगे हो रहे थे, हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे के खून के प्यासे थे। तब घाटी ही वो जगह थी जहां से ऐसी अप्रिय घटनाओं का संदेश नहीं आ रहा था। कश्मीर जो कि पाकिस्तान से एकदम सटा हुआ था, वहां अमन चैन था। घाटी में हर धर्म को मानने वाले लोग रहा करते थे। लेकिन कहानी बदलने लगी। देश में साम्प्रदायिकता की आग बुझने लगी और कश्मीर में धधकने लगी। आज गड़े मुर्दे क्यों उखाड़े जा रहे हैं? क्योंकि आज 20 जनवरी है। इसके पहले 19 जनवरी बीता है, इसके बाद 21 जनवरी आने वाला है। कश्मीरी इतिहास के तीन सबसे काले दिन। 19 जनवरी, 20 जनवरी और 21 जनवरी। ये वो दिन थे जब घाटी में धर्मनिरपेक्षता की होली जलाई गई थी। बलात्कार हुआ था महापुरुषों की उम्मीद का। 1990 का साल था, जनवरी का महीना, कड़कड़ाती ठंड। पिछले कई सालों से घट रही छिटपुट घटनाएं अपने अंजाम तक पहुंचने वाली थी। राजनीतिक अस्थायित्व थी, लोकतंत्र कराह रहा था। पाकिस्तान परस्त आतंकवाद और धार्मिक कट्टरता अपने चरम पर थी।

photo: the wire

कश्मीर में रह रहे पंडितों के खिलाफ एक उन्माद जड़ जमा चुका था। वे इस डर से पहले ही परिचित हो चुके थे। दिल्ली की नकारेपन और बेवकूफी के कारण गुस्सा भी था। केंद्र में जनता दल की सरकार थी। वीपी सिंह प्रधानमंत्री थे18 जनवरी, 1990 को जगनमोहन मल्होत्रा को जम्मू कश्मीर का राज्यपाल बनाकर दिल्ली से भेजा गया। 19 जनवरी को जगनमोहन जम्मू पहुंचे थे और अपना कामकाज संभाला था। 19 जनवरी की रात ही पहली बार एक भयावह जुलूस कश्मीर घाटी में निकली। बड़ी संख्या में इस्लामिक कट्टरता से भरे लोग सड़कों पर निकल आए। कश्मीरी पंडितों को खुलेआम निशाना बनाया गया। उनकी हत्या की गई, बलात्कार हुए। ये काम अगले दो दिनों तक जारी रहा। इन तीन दिनों में कश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ उस पर एक मुकम्मल किताब लिखी जा सकती है, लिखी भी गई है। घर से बेघर होना पड़ा। कश्मीर छोड़कर जाना पड़ा। जिन्हें जहां सहूलियत मिली वहीं भाग गए। एक दहशत लोगों के मन में घर कर चुकी थी। इन तीन दिनों में इतिहास की सबसे कुख्यात पलायन की घटना घटित हुई। कश्मीरी पंडित जम्मू के शरणार्थी शिविरों में रहे। केंद्र की वीपी सिंह सरकार और राज्य में जगमोहन दोनों ही मूकदर्शक बने रहे। कश्मीरी पंडितों के पलायन पर लिखी गई किताबों में ऐसा विवरण मिलता है कि जगमोहन ने कश्मीरी पंडितों को घाटी में रोकने और उन्हें सुरक्षा देने के बजाए घाटी से निकल जाने की ही सलाह दी। जगमोहन को लग रहा था कि समाधान यही है। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह इतिहास पर एक ऐसा काला धब्बा बनेगा जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकेगा।

photo: democraticaccent.com

इन तीन रातों में कितने कश्मीरी पंडितों को बेघर होना पड़ा, इस पर कोई आम सहमति नहीं है। जिन्होंने इतनी क्रूरता झेली वे आंकड़ों में तब्दील हो गए। कहते हैं कि एक व्यक्ति की हत्या को हत्या कहा जाता है लेकिन एक से अधिक लोगों की हत्या संख्या बन जाती है। घाटी में हुए कश्मीरी पंडितों के पलायन को लेकर आंकड़ों पर सबकी अपनी एक राय है। दो तरह के आतिवादी आंकड़े पेश किए जाते हैं। पहला आंकड़ा हिन्दू दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों का है जो इस आंकड़े को सात लाख बताते हैं। जबकि दूसरे वे लोग हैं जो इस घटना पर एक हल्का पर्दा डालने की कोशिश करते हैं और इस आंकड़े को एक लाख के आसपास बताते हैं। सच्चाई दो अतिरेकों के बीच ही कहीं टहल रही होती है। लेकिन सवाल संख्या का नहीं है। सवाल यह है इस घटना ने अब 31 साल पूरे कर लिए हैं। लेकिन आज तक क्यों कश्मीरी पंडितों को उनके घर वापस नहीं भेजा गया? सवाल यह है कि जो कश्मीरी पंडित आज भी घाटी में रहते हैं उन्हें सहूलियतें क्यों नहीं दी जाती? इन 31 सालों में कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा दोनों ही दलों की सरकार रही। लेकिन किसी सरकार ने कोई माकूल कदम क्यों नहीं उठाया?

photo: the quint

सोशल मीडिया से लेकर उत्तर भारत के आम बातचीत तक कश्मीरी पंडितों के पलायन को लेकर एक तथ्यपरक जानकारी की कमी साफ झलकती है। अक्सर लोग प्रोपेगैंडा में बहकर ही बोलते हैं। जरूरी है कि इतिहास को विभिन्न संदर्भों से जाना जाए। इतिहास को बरतना बेहद जरूरी है। आज भी कश्मीर घाटी में कुछ पंडित परिवार रहते हैं। करीब आठ सौ परिवार ऐसे हैं जो 1990 के पलायन में घाटी छोड़कर नहीं हटे। वे आज भी कश्मीर में हैं। उनकी आंखें अपने लोगों की राह आज भी निहार रही हैं। लेकिन उनका इंतजार कब पूरा होगा, इस सवाल का जवाब नियति की बाहों में है। कश्मीरी पंडित पलायन के बाद से राजनीति का विषय बनते रहे हैं। लेकिन राजनीति ने उनके हित में अब तक कोई कदम नहीं उठाया है। ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब घाटी में कश्मीरी पंडितों का एक संगठन अपने कुछ मांगों को लेकर भूख हड़ताल पर था। यह बात किसी के लिए बड़ा मुद्दा नहीं बन सकी थी। जिन पंडितों के पलायन पर खूब छिछली बहस होती है, उन्हीं पंडितों में से कुछ भूख हड़ताल पर थे तब किसी को फिक्र नहीं हुई।
खैर! एक काला सच आज 31 साल का हो गया। कश्मीरी पंडितों के पलायन की रक्तरंजित अतीत अपनी जवानी पूरी कर रहा है।

Related Articles

Leave a Comment