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आध्यात्मिकता में जीते हैं जनजातीय समुदाय – डॉ. कपिल तिवारी

by Khabartakmedia

जनजाति समाज नगरीय समाज से आगे है। जनजाति समाज का आतिथ्य मन को गदगद कर देने वाला होता है। जब जनजाति समाज के यहाँ कोई अतिथि आता है, तब वे अतिथि को अपने कमरे में सुलाकर स्‍वयं खुले आसमान के नीचे सो जाते हैं। जनजाति समाज अतिसंवेदनशील, अतित्यागी और अनुशासन प्रिय समाज है। जनजाति समाज की धार्मिक परंपरा और देवलोक विषय पर आयोजित यह राष्ट्रीय संगोष्ठी अपने आप में एक अद्भुत आयोजन है। ये बातें शनिवार को भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय में दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान व आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, संस्‍कृति विभाग के तत्‍वावधान में आयोजित ‘जनजातीय धार्मिक परंपरा और देवलोक’ विषयक तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए मुख्‍य अतिथि संस्‍कृति व पर्यटन मंत्री उषा ठाकुर ने कही। इस अवसर पर अकादमी द्वारा प्रकाशित डॉ. धर्मेन्‍द्र पारे की पुस्तक ‘भारिया देवलोक’ का लोकार्पण भी हुआ।

बीज वक्‍तव्‍य देते हुए लोक संस्‍कृति अध्‍येता डॉ. कपिल तिवारी ने कहा कि जनजाति समाज ऐसा अनुशासन प्रिय समाज है, जो सब कुछ स्‍वयं करता है। वह किसी पर निर्भर नहीं रहता। नगरीय समाज अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए सरकारों पर निर्भर रहता है, किंतु जनजाति समाज की सरकारों व किसी अन्य से कोई अपेक्षा नहीं होती। जनजातीय समुदाय गहरी आध्‍यमिकता में जीते हैं। डॉ. तिवारी ने कहा कि जो लोग धर्म में नहीं, धार्मिकता में थे, राज्य में नहीं, एक अनुशासन में थे, उनको हमने पिछड़ा कहा और जो रोज-रोज राज्य के गुलाम हो रहे थे, हर छोटी चीज के लिए राज्य की ओर आशा भरी निगाहों से देखते हैं, वे कथित रूप से विकसित कहलाने लगे।

विदेशियों ने हमारी संस्कृति को पहुँचाया नुकसान: रामचंद्र खराड़ी

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि रामचन्द्र खराड़ी ने कहा कि देश में अभी तक जनजातियों के बारे में वही पढ़ाया जाता था, जो विदेशी लेखक लिखकर गए। हमारी जनजाति संस्कृति को मिशनरियों द्वारा नष्ट करने का प्रयास किया गया, लेकिन जनजाति समाज के लोग अपने मूल और अपनी संस्कृति से नहीं हटे।

जनजातीय समुदाय को भटकाने का हो रहा प्रयास: मनोज श्रीवास्तव

प्रथम अकादमिक सत्र को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता अपर मुख्‍य सचिव मनोज श्रीवास्तव ने उपनिवेशवाद और नव उपनिवेशवाद को समझाते हुए बताया कि किस प्रकार अंग्रेजों ने जनजातियों को हिन्दू धर्म से अलग दिखाने का षडयंत्र किया है, जो पूर्णतया कल्पनाओं पर आधारित है। नव उपनिवेशवाद में वनवासियों को हिन्दू पौराणिक का अंग बताते हुए उन्हें असुर बताया है। वास्तविकता यह है कि जनजातीय लोग जिन देवताओं की पूजा अर्चना करते हैं, वे हिन्दू धर्म में भी मौजूद हैं। हमें यूरोप की साज़िश को भी समझने की आवश्यकता है। इसी सत्र में घुमन्‍तू जनजातियों में देवलोक की संकल्‍पना पर गिरीश प्रभुणे ने विचार व्‍यक्‍त किया। वहीं, अध्‍यक्षता कर रहे इतिहासकार डॉ. सुरेश मिश्र ने गोंड राजाओं के बारे में विस्‍तार से प्रकाश डाला। इस सत्र में धीरा शाह ने जनजातीय धार्मिक अनुष्‍ठान एवं देवलोक और डॉ. मालती सोलंकी ने जनजातीय समाज में इंदल पूजा विषय पर शोधपत्र पढ़ा।

द्वितीय सत्र में मानव संग्रहालय भ्रमण कार्यक्रम आयोजित हुआ। यहाँ की वीथियों को देखकर प्रतिभागी मंत्रमुग्‍ध हो गये। अंतिम सत्र में सांस्‍कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जिसमें कोरकू दशहरा नृत्‍य की प्रस्‍तुति हुई।
ठेंगड़ी शोध संस्‍थान के निदेशक डॉ. मुकेश कुमार मिश्रा ने बताया कि 10 व 11 जनवरी, 2021 को भारतीय आख्‍यान परंपरा, जनजातीय समुदायों में धार्मिक अंर्तसंबंध, जनजातीय-वैदिक तथा पौराणिक देवलोक, देवलोक सम्बन्धी जनजातीय नृत्य/गीत-संगीत, शिल्प/चित्रांकन/वाद्य इत्यादि कला-रूपों में अभिव्यक्त जनजातीय देवलोक आदि विषयों पर व्‍याख्‍यान के अतिरिक्‍त परिचर्चा सत्र भी संचालित होंगे। कार्यक्रम में मुख्‍य रूप से संस्कृति विभाग के संचालक अदिति कुमार त्रिपाठी, आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी के निदेशक डॉ. धर्मेंद्र पारे, वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामचंद्र खराड़ी, बुधपाल, नेहा तिवारी उपस्थित रहे।

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