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प्रभु जोशी: रंगों, लब्जों और आत्मीय आवाज़ के शानदार सिलसिले का जाना!

by Khabartakmedia

खबर तक के लिए प्रो. निरंजन सहाय

बोलती आंखें, शब्दों को साध लेने का अपूर्व हुनर और मखमली आवाज़ में आत्मीयता का दुर्निवार आकर्षण- इन सबसे प्रभु जोशी का चुम्बकीय व्यक्तित्त्व बना था। उन्हें कुदरत ने एक और नियामत से नवाजा था। मालवा के लोक में व्याप्त निर्गुनियों का वह फलसफा जो अक्सर कुमार गन्धर्व की दुनिया में अनेक बार प्रकट होता था-‘निर्भय, निरगुन, गुनी रे गाऊँगा’। यह फलसफा प्रभु जोशी के संसार में रंगों, शब्दों और कहन के माध्यम से दुनिया को अपने अंदाज़ में रोशन करता था। कोरोना काल के निर्मम दौर ने उन्हें भी हमसे छीन लिया। कबीर ने कहा, ‘दुखिया दास कबीर है जगे अरु रोवे’।

रविवार यानी 02 मई, 2021 का दिन। पूरे परिवार के साथ भतीजा शतायु भी उनके साथ थे, वे उस मंजर को याद करते हुए कहते हैं, ‘वे घर पर थोड़ा घबरा रहे थे। हम ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था में लगे थे। उन्हें परेशान देख, मैं उनके पास गया। सीने पर हाथ रखकर बोला, पापा, चिंता मत कीजिए, बहुत लोग आपके साथ हैं। उनकी प्रार्थनाएं सुनी जाएंगी। आपको कुछ भी नहीं होगा। उन्होंने जवाब दिया, ‘बेटा मृत्यु के कान नहीं होते। उस तक हमारी कोई आवाज नहीं पहुँच पाती। उसकी सिर्फ आँखें होती हैं, जिससे हमें एकटक देखती रहती है। किसी दिन हमें चुनकर उस पार ले जाएगी।’ और हुआ भी वही।

अंदाजा नहीं था कि ये पंक्तियाँ मेरे लिए, उनके हजारों-लाखों पाठकों के लिए उनके आखिरी शब्द होंगे। वे अक्सर कहते थे कि कैसे खींच दूँ मैं समय और आकाश में पूर्ण विराम। कोरोना ने उनके जीवन पर विराम लगा दिया। मंगलवार यानी 04 मई की सुबह चार बजे उनकी तबीयत ज़्यादा खराब हुई और ऑक्सीजन लेवल साठ-पैंसठ पहुँच गया। उनके आत्मीय साथी और विख्यात व्यंग्यकार डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने दैनिक भास्कर को बताया, सुबह 4 बजे पुनर्वसु ने वाट्सएप पर डाला कि दो ऑक्सीजन सिलेंडर चाहिए तो प्रभु को कॉल किया, थोड़ा डांटा, समझाया और अस्पताल जाने के लिए राजी किया। वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग उनके लिए सिलेंडर लेकर पहुंचे। मंगलवार सुबह 10 बजे अरबिंदो में एक बेड मिल भी गया। वहां जाते समय एंबुलेंस में पुनर्वसु से बोले- गुड्डू मैं थक गया हूँ यार! उसके गले मिले और विदा हो गए।

मध्यप्रदेश के देवास के रांवा गाँव में 12 दिसम्बर, 1950 को उनका जन्म हुआ। चित्रकला का उन्हें बचपन से ही शौक था। जिसे उन्होंने अपने जीवन के पूर्वार्ध से उतरार्ध काल तक बरकरार रखा। वे एक चित्रकार, कहानीकार, संपादक, आकाशवाणी अधिकारी और टेलीफिल्म निर्माता के तौर पर जाने जाते थे। रसायन शास्त्र तथा अंग्रेजी में उन्होंने मास्टर उपाधि प्राप्त की। जब वे आठ साल के थे, तब रंगों के साथ खेलना शुरू कर दिया था। पहला चित्र उन्होंने महाभारत की एक घटना पर आधारित बनायी। जिसमें द्रौपदी को छेड़े जाने पर कीचक की भीम द्वारा बदला लेने के कर्म में धुनाई की जा रही थी।

कहना न होगा यह केवल एक चित्र नहीं था बल्कि एक सचेत निगाह की कला अभिव्यक्ति थी। जो अपने अंदाज़ में समाज, संस्कृति और परम्परा की दुनिया में प्रवेश कर रही थी। समय बीतता गया और प्रभु जोशी ने अपनी पेंटिंग की रुचियों को नयी-नयी कल्पनाओं में ढालने का कलात्मक विवेक जारी रखा। फिर यह प्यास उन्हें इन्दौर के ललित कला संस्थान के कला गुरुओं के सानिध्य में ले गयी। जहाँ उन्होंने अपनी कला अभिरुचियों का सम्वर्द्धन और परिष्कार किया। वे मशहूर चित्रकार डी. जे. जोशी की पेंटिंग से बेहद प्रभावित हुए। लेकिन उन्होंने अपनी एक निजी शैली का विकास किया। यह शैली रंगों के बहाव पर केन्द्रित थी, जिसमें विशेष प्रकार के टेक्सचर का भी कलात्मक उपयोग किया गया था।

मशहूर बालिका मोनालिसा की पेंटिंग

उनकी कल्पनाशीलता और सृजनशीलता ने अनेक कलात्मक उपलब्धियों को सम्भव किया। इम्पैक्ट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ऑन ट्राइबल सोसायटी विषय पर किये गए ‘ऑडियंस रिसर्च विंग’ के राष्ट्रीय पुरस्कार से उन्हें नवाजा गया। उनकी कलादृष्टि में स्वाभाविक अंदाज़ में उपस्थित कल्पनाशीलता, तीक्ष्णता का यह कमाल भी हुआ कि उनके दो चित्रों को अमरीका और चार राष्ट्रों द्वारा संचालित बेस्ट इंटरनेशनल गैलरी अवार्ड के विशेष पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। ये दो चित्र थे- स्माइल ऑफ चाइल्ड मोनालिसा और लैंडस्केप। ‘स्माइल ऑफ चाइल्ड मोनालिसा’ ब्रिटेन के एक अधिकारी की बेटी का चित्र था, जो तेल रंग से यथार्थवादी शैली में बनाया गया। बच्ची की मुस्कान ही इस चित्र की खासियत है। चेहरे पर बाल सुलभ मासूमियत और बालों में सफेद फूल सौम्यता और सौन्दर्य में चार चाँद लगाते नज़र आते हैं| चित्र को देखकर ब्रिटेन के प्रसिद्ध जल रंग चित्रकार टेऊ बोर लिंगार्ड ने उनके बारे में कहा ‘मै हैरान हूँ कि आपने अपने चित्रों में ऐसा अनलभ्य प्रभाव कैसे पैदा किया?’ मशहूर अन्तरराष्ट्रीय चित्रकार पावेल ग्लाद कोव ने उन्हें मौलिक और विशिष्ट चित्रकार कहते हुए यह दर्ज किया कि जल रंग चुनौतीपूर्ण माध्यम जिसे प्रभु जोशी ने अपने ख़ास अंदाज़ में ढाला। अमरीकी कला संसार ने उन्हें हिन्दुस्तान का पिकासो कहा।

इस पेंटिंग की करीब वैसी ही रहस्यमय और रुकी-रुकी-सी हंसी है, जैसी कि हम पिछले 500 सालों से लियानार्दो दा विंची की मोनालिसा के चेहरे पर देखते आ रहे हैं। उन्होंने अनेक पोर्ट्रेट और दृश्य चित्र बनाये। उनके द्वारा बने पोर्ट्रेट के लिये गुलजार ने कहा- ‘लेण्डस्केप तो सांस लेते हैं, लेकिन पोर्ट्रेट रूह के लैण्डस्केप हैं।’ यानी प्रभु जोशी के दृश्य चित्रों में जीवन्तता है पर पोर्ट्रेट आन्तरिक दृश्य (अन्तर्मन) को व्यक्त करते हैं। क्या संयोग है कि 23 अगस्त, 2010 को अभिव्यक्ति के वेब पेज पर राजा रवि वर्मा पर लिखते हुए जो प्रभु जोशी ने कहा उनसे स्वयं उनकी कला उपस्थिति भी अनावृत होती है,’वे लोक और शास्त्र के मध्य एक अखण्ड सेतु थे। उनकी कला का डी.एन.ए. हमारी परम्परा से मिलता है। उन्हें पश्चिम की बाजारोन्मुख समकालीन कलाकार-बिरादरी चाहे अपने गोत्र का न मानते हुए भुला दे, लेकिन उनकी कृतियां ही उनका स्मारक हैं। उन्हें हम भारतीय चाहे याद न करें, लेकिन ईश्वर जरूर याद रखेगा, क्योंकि उन्होंने उसके कुनबे और अवतारों को मनुष्यों से परिचित कराया था। …… कला-मर्मज्ञों की रेवड़ उन्हें चाहे दफ्न कर दे, लेकिन वे उस अमर को गढ़ते हुए स्वयं कलाजगत के अनश्वर नागरिक हो चुके हैं। वे अपनी तमाम आलोचनाओं और निंदाओं से ऊपर हमें हमेशा याद आते रहेंगे।’

प्रभु जोशी को अलग-अलग क्षेत्रों के लोग भिन्न-भिन्न छवियों में जानते थे। जब वे कुमार गंधर्व जैसे महान संगीतकारों के साथ बैठते-उठते थे तो संगीत की मंडली उन्हें कलाकार और कलामर्मज्ञ समझती थी। कहानीकार के रूप में साहित्य जगत में उन्हें ऊँचा स्थान मिला था। उन्हें हिन्दी गल्प संसार का ऐसा अनूठा कथा-नागरिक कहा गया था जो सूक्ष्मतम संवेदनाओं के रेशों से ही, विचार और संवेदना के वैभव का वितान रचते थे। किस हाथ से, प्रभु जोशी की लम्बी कहानियाँ और उत्तम पुरुष नाम से उनके कथा संग्रह छपे, जिन्हें हिन्दी पाठकों ने खूब चाव से पढ़ा। पत्रकार के तौर पर वे सामयिक विषयों के सटीक टिप्पणीकार और विश्लेषक के रूप में जाने गए। आकाशवाणी और दूरदर्शन में काम करते हुए उन्होंने अपनी रचनात्मक प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और सैकड़ों प्रतिभाएं गढ़ीं।

रेडियो में काम करते हुए उन्होंने रेडियो को अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाए। बर्लिन में जनसंचार की अंतरराष्ट्रीय सपर्धा में आफ्टर ऑल हाउ लांग रेडियो कार्यक्रम को जूरी का विशेष पुरस्कार मिला। उन्होंने धूमिल, मुक्तिबोध, पिकासो, कुमार गंधर्व व उस्ताद अमीर अली खां आदि पर केंद्रित रेडियो कार्यक्रम तैयार किया। जिसे आकाशवाणी का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उन्हें मध्यप्रदेश के भारत भवन का गजानन माधव मुक्तिबोध सम्मान भी मिला।
उनके जाने से हमारे दौर ने एक ऐसे सजग, साहसी और अपूर्व सर्जक को खो दिया नि:संदेह जिसकी रचनात्मक दुनिया कई पीढ़ियों के विवेक को गढ़ने में मुकम्मल भूमिका निभाएगी।

(प्रो.निरंजन सहाय महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में हिन्दी के प्रोफ़ेसर और नोडल ऑफिसर यूजीसी के रूप में कार्यरत हैं। हिन्दी की अधिकांश प्रतिष्ठित पत्र/पत्रिकाओं में प्रो. सहाय के नियमित लेखन प्रकाशित होते रहते हैं।)

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1 comment

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बजरंग बिहारी May 7, 2021 - 3:48 pm

प्रभु जोशी पर बहुत आत्मीय, अंतरंग किन्तु उनके महत्त्व को ठीक-ठीक रेखांकित करते हुए प्रो. निरंजन सहाय ने यह श्रद्धांजलि लेख प्रस्तुत किया है।
प्रभु जोशी की स्मृति को नमन।
लेखक को साधुवाद।

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