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शेषनारायण सिंह: जाना एक खुद्दार हौसले का!

by Khabartakmedia

खबर तक के लिए निरंजन सहाय …

बेबाक लेकिन सौम्य, गाँव के खेतों–दरख्तों और पुरवाइयों से रचे-बसे शरीर और मन के साथ लोक परम्परा में गहरे पैठे पर नयी-से-नयी किताबों के शौकीन, खुद्दारी ऐसी कि हर संकट में खुद को बिखरने से बचाया ही नहीं, समय की हवा में आंधी के तिनके की तरह बह जाने वाली दुनियादारी से भी खुद को खूबसूरती से सलामत रखने का हुनर भी विकसित किया। ऐसे थे हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी की प्रिंट और विजुअल मीडिया के आला दरजे के हुनरमंद पत्रकार शेषनारायण सिंह। बहुभाषाविद् और बहुपठित, रिश्तों की संजीदगी को निभाने वाले शेषनारायण सिंह शुक्रवार यानी 07 मई, 2021 को दुनिया को अलविदा कह गए।

दिल्ली से करीब उत्तर प्रदेश के उपनगर, ग्रेटर नोएडा के जिम्स अस्पताल के आईसीयू-5, बेड नंबर-7 पर कोविड महामारी की नई मारक लहर में उनका निधन हो गया। बीते दिन ही उन्हें प्लाज़्मा थैरेपी दी गई थी, लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ। उनका जाना उनके दोस्तों को ही नहीं, हिंदुस्तानी सियासत, मीडिया और दिल्ली के जवाहरलाल नेह्ररू विश्विद्यालय (जेएनयू) के देश और देशान्तर में पसरे अनेक पूर्व विद्यार्थियों को गमजदा कर गया। उनके बेहद करीबी साथी और पत्रकार चन्द्रप्रकाश झा ने मीडिया विजिल में उन्हें याद करते हुए लिखा, ‘शेष भाई’ के रूप में ज्ञात मानवीय गुणों से लबरेज इस इंसान ने मीर तकी मीर और मिर्जा गालिब ही नहीं अल्लामा इकबाल समेत तमाम शायरों को पढ़ रखा था। यह अकारण नहीं है कि चन्द्रप्रकाश जी ने उन्हें याद करते हुए जो संस्मरण लिखा उसमें उनके प्रिय शायर मीर तकी मीर के शेर को उद्धृत किया-
“सिरहाने ‘मीर’ के आहिस्ता बोलो
अभी टुक रोते रोते सो गया है।”

अवधी मन में आकंठ रचे-बसे शेषनारायण सिंह की यह दिली ख्वाहिश थी कि मुल्क की चकाचौंध भरी राजधानी दिल्ली छोड़ सुल्तानपुर के लम्भुआ तहसील के सरयू किनारे बसे अपने गाँव शोभीपुर में लौट आएँ। अभी बीते साल ही उन्होंने अपने कॉलम में लिखा, ‘आजकल मुझे अपना गाँव बहुत याद आता है, आम में खूब बौर लगे हैं, महुआ के पेड़ के नीचे सफ़ेद चादर जैसे महुआ के फूल टपके हुए हैं, न गर्मी है, न ठंडी है। नीम में बिलकुल नई ललछौंह पत्तियां आ गयी हैं| दही में गुड़ डालकर मेरी बहन ने दे दिया है, गरम-गरम रोटी के साथ खा लिया है और स्कूल जाने की तैयारी है। स्कूल से लौटते हुए प्यास लग जाती थी। इसलिए मेरे बाल सखा अमिलियातर के नन्हकऊ सिंह के झोले में लोटा डोरी विद्यमान है। हम जूते नहीं पहनते थे तब, होते ही नहीं थे। इसलिए लौटते हुए गरम हो चुकी दोपहर की बलुही ज़मीन खल जाती थी। घास के टुकड़ों पर पाँव रखने की कोशिश में बहुत कूद-फान करना पड़ता था। पेड़ों के नीचे शान्ति होती थी।’ यह महसूस करना आसान है कि उनके जीवन की जड़ें कहां टिकीं थीं। इतने गहरे टिके जड़ों को ही भारतीयता की पूरी अवधारणा, उसकी संश्लिष्टता और उसके सपने साफ़-साफ़ समझ आते हैं। उनके पूरे लेखन में हम निर्भयता और स्वाभिमान के नज़रिए के साथ ही स्पष्टता और सटीकता की भरोसेमंद तस्वीर अलग-अलग अंदाज़ में उभरता महसूस करते हैं।


शेष नारायण सिंह सन 1973 में सुल्तानपुर के कादीपुर में संत तुलसीदास डिग्री कॉलेज में इतिहास के अध्यापक के रूप में जीविकोपार्जन का काम शुरू किया। कॉलेज की अंदरूनी राजनीति के चलते उनकी नौकरी छूट गयी। सुल्तानपुर में शिक्षक की नौकरी छूट जाने के बाद वे सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध में बिना कुछ ज़्यादा सोचे-समझे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में आ पहुंचे। सहजता और किसानी परिवार से जुड़ा मन ऐसा कि उनके लिए इतना ही काफी था कि जेएनयू में सुल्तानपुर के दूर-पास के कुछ परिचित पढ़ाई कर रहे थे।
वह दौर ऐसा था कि दोआब के पढ़े-लिखे नौजवानों के लिए जेएनयू चुम्बक बना हुआ था।

शेषनारायण जी के उन दिनों के आत्मीय साथी उपाध्याय अमलेन्दु ने 8 मई, 2021को हस्तक्षेप के ‘आपकी नज़र’, स्तंभ में उस दौर को याद करते हुए लिखा, ‘जेएनयू में उस जमाने जैसे रिवाज में ही था कि होस्टल की जगह को लेकर निजी संपत्तिभाव बहुत कम रहता था और नये आये छात्रों को खुला आतिथ्य मिलता था। संभवत: एक-दो दिन की गैरहाजिरी के बाद, होस्टल के अपने कमरे पर पहुंचा तो वहां, शेष नारायण सिंह जमे हुए थे। पता चला कि मित्र घनश्याम मिश्र ने उन्हें मेरे कमरे पर टिका दिया था। तब से शुरू हुई हमारी दोस्ती, जिसमें राजनीतिक-वैचारिक दोस्ती का तत्त्व ही ज्यादा था, कभी क्षीण तो कभी वेगवान जरूर हुई, लेकिन एक सदानीरा की तरह इन तमाम दशकों में उसमें तरलता बराबर बनी रही।

यह वह जमाना था जब पढ़ाई-लिखाई और सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता, निजी कैरियर की चिंता के लिए बहुत कम जगह छोड़ती थी। वह अचानक भाषा इंडोनेशिया के छात्र हो गए। फिर कुछ और। यह सबसे पहले ज्ञानार्जन का समय था, बाकी सब बाद में आता था। शेष नारायण ने उस जमाने में मार्क्सवाद की कितनी ही किताबें मुझसे लेकर पढ़ी होंगी और कुछ तो लौटाई भी नहीं होंगी। एक किताब तो दसियों साल बाद, जब मैं शेषनारायण की किसी अस्वस्थता के चलते हाल जानने के लिए उनके घर पर गया था। साथ ले जाने के लिए मैंने उठा भी ली थी। लेकिन, शेषनारायण की इस हास्यमिश्रित दलील ने मुझे निरुत्तर कर दिया कर दिया कि छोड़ दो बच्चे क्या कहेंगे? अंकल दोस्त को देखने नहीं किताब लेने आए हैं! किताब वहां की वहीं रखी रह गयी।’

व्यक्तित्त्व के निर्माण में अनेक तत्त्वों की भूमिका ने शेषनारायण जी को सिरजा, पर कुछ चीजें उनमें ताउम्र बरकरार रही। अवध के किसानी मन का संस्कार, जेएनयू की बौद्धिक विरासत, रिश्तों को निभाने की आत्मीय वृत्ति, प्रतिबद्धता और खुद्दारी का दूर्दांत आग्रह। अपने स्वाभाव की इन विशेषताओं का उन्हें फ़ायदा और नुकसान दोनों हुआ। अनेक नौकरियाँ उन्हें छोड़नी पडीं और अनेक संस्थाओं ने उन्हें सिरा-आँखों पर भी बैठाया। अपने चार दशक के लम्बे पत्रकारीय जीवन में उन्होंने एनडीटीवी, न्यूज नेशन जैसे संस्थानों में काम किया, उर्दू के आला अखबार शहाफत के ज्वाइंट एडिटर रहे, अनेक ब्लॉगों के बेबाक लेखक रहे, राष्ट्रीय सहारा में ऊंचे ओहदे पर रहे। जागरण इंस्टिट्यूटऑफ मैनेजमेंट एंड मास कम्यूनिकेशन में प्रोफेसर रहे। जब उनका देहावसान हुआ तब वे देशबंधु के राजनीतिक मामलों के सम्पादक के रूप में कार्यरत थे। वे कभी रुके नहीं, अनेक बार उनके आत्मीय साथी अचम्भित रह जाते कि सर्वथा भिन्न मिजाजों को कैसे साध रहे थे। उन्हें एनडीटीवी से जब निकाला गया, तब वे कुछ दिन परेशानी भरे दौर से गुजरे पर जल्दी ही सम्हल गए।

मीडिया मिरर में उस दौर को शेषनारायण सिंह ने बड़ी संजीदगी से याद करते हुए लिखा, ‘हमें खुशी होती है कि हमको एनडीटीवी ने नौकरी से निकाल दिया था। शुक्रिया, न्यूज़ 18इण्डिया, शुक्रिया सी एन बी सी-आवाज़, शुक्रिया, एबीपी न्यूज़, शुक्रिया, लोकसभा टीवी, शुक्रिया टाइम्स नाउ, शुक्रिया सैयदेन ज़ैदी, शुक्रिया न्यूज़ नेशन, आपने मुझे इस लायक समझा कि मैं आपके पैनल पर आ सकूं, आपने मुझे इज्ज़त बख्शी और एक नई पहचान और आत्मविश्वास दिया। आपकी वजह से आज मैं सड़क चलते पहचाना जाता हूं। शुक्रिया देश बन्धु, इन्कलाब, उर्दू सहाफत,उर्दू सहारा रोजनामा, शुक्रिया अजय उपाध्याय, आपने काम करने का मौक़ा दिया।

वे चले गए। मीडिया की दुनिया में ऐसे पढ़े लिखे और बेबाक शख्सियत का दीदार कभी-कभी होता है। उनको ठीक से समझने के लिए उनके एक मीडिया पोस्ट को उद्धृत करना मौजू होगा। जिसका जिक्र उनके साथी उपाध्याय अमलेंदु ने किया, महाराष्ट्र के पुरुष, महिला और आदिवासी किसानों ने 2017 में नासिक से मुंबई तक लॉन्ग रेड मार्च मार्च निकाला तो फ़ोटोग्राफी की वैश्विक एजेंसी ‘गेती’ की ओर से जारी उनकी फोटो देख अचंभित हुआ, दुनिया को मामला सरल रूप से समझाने के लिए शेष भाई ने सोशल मीडिया पर इकबाल का एक अशआर माने के साथ लिख दिया :
“जिस खेत से दहकां को मयस्सर नहीं रोज़ी
उस ख़ेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो।”

*दहकां = किसान, मयस्सर= उपलब्ध, ख़ोशा-ए-गंदुम= गेंहू की बालियां।

(प्रो.निरंजन सहाय महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में हिन्दी के प्रोफ़ेसर और नोडल ऑफिसर यूजीसी के रूप में कार्यरत हैं। हिन्दी की अधिकाँश प्रतिष्ठित पत्र/पत्रिकाओं में प्रो. सहाय के नियमित लेखन प्रकाशित होते रहते हैं।)

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1 comment

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गजेंद्र पाठक May 9, 2021 - 4:56 pm

बेहद मार्मिक संस्मरण और हृदय विदारक श्रद्धांजलि.अविस्मरणीय व्यक्तित्व

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