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डॉ. कुँवर बेचैन: ज़िन्दगी से मौत फिर आगे निकल जाती है क्यूँ?

by Khabartakmedia

खबर तक के लिए प्रो. निरंजन सहाय…

मनहूस दौर के एक और काले पन्ने से गीतों-ग़ज़लों की दुनिया का सामना हुआ। उदास और बदरंग दौर के चेहरे की शिकन कुछ और गहरी हो गयी। गुरुवार 29 अप्रैल को हिन्दी ग़ज़लों–गीतों के बेताज बादशाह कुँवर बेचैन इस संसार को हमेशा के लिए अलविदा कह गए। कोरोना और बदइन्तजामी के निर्मम दौर ने एक ऐसे नेक और संवेदनशील अदीब को हमसे दूर कर दिया जिसकी कमी हमेशा खलेगी। अपनी एक ग़ज़ल में बेचैन जी ने कहा, “ये सुना था मौत पीछा कर रही है हर घड़ी, ज़िन्दगी से मौत फिर आगे निकल जाती है क्यूँ” – यह सच हमारे दौर का जैसे ध्येय वाक्य बन गया है।

डॉ. बेचैन कोविड-19 से तकरीबन दस-बारह दिन पहले संक्रमित हो गए थे। नियति का कैसा दौर है, उन्हें उत्तर प्रदेश के सुविधा-सम्पन्न जनपदों नोएडा और गाजियाबाद में कहीं पर अस्पताल में बेड भी नहीं मिल रहा था। जीवन की मूलभूत ज़रूरतों के भी पूरा न हो पाने के निर्मम दौर में कवि कुमार विश्वास ने ट्वीट करके लोगों से मदद मांगी। फिर गौतम बुद्ध नगर के सांसद डॉ. महेश शर्मा ने उनके ट्वीट का संज्ञान लिया, और उन्हें सेक्टर 27 स्थित अपने अस्पताल में भर्ती करवाया। पर तबतक शायद देर हो चुकी थी और संक्रमण की क्रूर मौजूदगी ने उनके जीवन पर ग्रहण लगा दिया।

हमारे दौर के महत्त्वपूर्ण शायर और गायक हरिओम ने उनके देहावसान पर उन्हें बेहद संजीदगी से याद करते हुए कहा, “ज़िंदगी का सफ़र कभी-न-कभी ख़त्म होता ही है, लेकिन कुछ लोग ऐसे जाते हैं कि न सिर्फ़ मंज़िलें रौशन हो उठती हैं बल्कि जिन रास्तों से वे गुज़रते हैं वो भी सदियों तक चमकते रहते हैं।” हमारे दौर के और आने वाले तमाम वक़्तों के बेहतरीन शायर-गीतकार कुंवर बेचैन जी ऐसी ही एक शख़्सियत रहे। जब तक लिखते रहे ज़िंदगी संवरती रही और अब जब वह हमारे बीच नहीं रहे तो धरती थोड़ा और नम हो चली है और आसमान थोड़ा और रंगीन। यह उनकी रचनाओं का कमाल तो है ही, पर उनके स्वभाव का कमाल कहीं ज़्यादा है। जिसमें रंग भी थे, विनम्रता और उम्मीद थी। ऐसे लोग कहीं नहीं जाते। हमेशा हमारे सामने रहते हैं-हमें सही राह दिखाते हुए।

हिंदी ग़ज़ल और गीत के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर कुंवर बेचैन का जन्म उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के उमरी गाँव में हुआ था। बेचैन उनका तख़ल्लुस (उपनाम) था। असल में उनका नाम डॉ. कुंवर बहादुर सक्सेना था। बेचैन जी गाजियाबाद के एम.एम.एच. महाविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष रहे। उनका नाम हिन्दी के बड़े गीतकारों और शायरों में शुमार किया जाता था। अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में सादगी बरतने वाले कुँवर जी व्यवहार से सहज, वाणी से मृदु, ऐसे सर्जक थे जिन्हें सुनना-पढ़ना अपने आप में अनोखा अनुभव होता था। उनकी रचनात्मक दुनिया में अपनेपन के गाढे रंग और सकारात्मकता की मौजूदगी हमेशा ताजगी और नएपन का अहसास कराती थी। वे दरअसल अधूरी दुनिया की पूरे ख्वाब से लबरेज थे। जैसा कि उन्होंने अपनी एक गज़ल में कहा था,
“इस तरह मिल कि मुलाक़ात अधूरी न रहे
ज़िंदगी देख कोई बात अधूरी न रहे।”

कुँवर बेचैन का रचना संसार बहुत व्यापक और बहुरंगी है। उनके रचना संसार में शामिल गीत-संग्रहों – पिन बहुत सारे (1972), भीतर साँकलः बाहर साँकल (1978), उर्वशी हो तुम (1987), झुलसो मत मोरपंख (1990), एक दीप चौमुखी (1997), नदी पसीने की (2005), दिन दिवंगत हुए (2005), ग़ज़ल-संग्रह- शामियाने काँच के (1983), महावर इंतज़ारों का (1983), रस्सियाँ पानी की (1987), पत्थर की बाँसुरी (1990), दीवारों पर दस्तक (1991), नाव बनता हुआ काग़ज़ (1991), आग पर कंदील (1993), आँधियों में पेड़ (1997), आठ सुरों की बाँसुरी (1997), आँगन की अलगनी (1997), तो सुबह हो (2000), कोई आवाज़ देता है (2005) के साथ कविता-संग्रह नदी तुम रुक क्यों गई (1997), शब्दः एक लालटेन (1997) और पाँचाली (महाकाव्य) को हिन्दी संसार बार-बार याद करेगा।

पिछले साल हिन्दुस्तान के मकबूल शायर राहत इन्दौरी का भी कोरोना से इंतकाल हुआ था। जिन्होंने अपनी एक ग़ज़ल में कहा, था –
“अपने हाकिम की फकीरी पे तरस आता है
जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगे।”
“जुबां तो खोल, नजर तो मिला, जवाब तो दे
मैं कितनी बार लुटा हूँ, हिसाब तो दे।”

फानी दुनिया से उनकी विदाई से उनके आत्मीय साथी कुँवर बेचैन बेहद गमजदा थे, उन्होंने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में उनके बारे में जो लिखा, वह बेहद महत्त्वपूर्ण है। क्या संयोग है कि वे सभी बातें कुँवर बेचैन पर भी अक्षरक्ष: सटीक जान पड़ती है, “वे मेरे अत्यंत प्रिय शायर थे। मैं ही क्या पूरी दुनिया ही उनकी शायरी की दीवानी थी जो उनकी शायरी को दिल में उतार लेती थी। उनके पढ़ने का अंदाज़ अनोखा था। जो शब्द भी उनकी ज़ुबान से निकलता था वह साक्षात दर्शन देने लगता था, पूरी तरह साकार हो उठता था। यूँ कहूँ कि अवतार लेकर सामने आ खड़ा होता था तो अतिशयोक्ति न होगी। सरल और बिल्कुल सहज भाषा में अपने कथ्य को उकेरने की कला जैसी उनके पास थी वैसी बहुत कम लोगों के पास होती है। कविता पढ़ते हुए वे अपनी शायरी में पूरी तरह डूब जाते थे और श्रोताओं को भी खूब डुबकियाँ लगवाते थे। रोचकता उनकी पढन्त की एक अलग विशेषता थी। हाज़िर ज़वाब ऐसे कि दूसरा देखता ही रह जाये।”

कुँवर बेचैन चले गए पर आने वाली पीढ़ियों के लिए ज़िंदगी का संदेश देते गए , जैसा कि उन्होंने अपनी एक ग़ज़ल में कहा-

“एक ही ठाँव पे ठहरेंगे तो थक जाएंगे
धीरे-धीरे ही सही राह पे चलते रहिए
आपको ऊँचे जो उठना है तो आँसू की तरह
दिल से आँखों की तरफ हँस के उछलते रहिए
शाम को गिरता है तो सुबह संभल जाता है
आप सूरज की तरह गिर के संभलते रहिए
प्यार से अच्छा नहीं कोई भी साँचा ऐ ‘कुँअर’
मोम बनके इसी सांचे में पिघलते रहिए।”

pro. niranjan sahay

(प्रो.निरंजन सहाय महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में हिन्दी के प्रोफ़ेसर और नोडल ऑफिसर यूजीसी के रूप में कार्यरत हैं। हिन्दी की अधिकांश प्रतिष्ठित पत्र/ पत्रिकाओं में प्रो. सहाय नियमित रूप से लेखनरत हैं।)

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