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जवाहरलाल नेहरू बनाम नरेंद्र मोदी, आंदोलन पर दोनों सरकारों के रुख

by Khabartakmedia

साल 2014 के बाद भारत में पंडित जवाहरलाल नेहरू को लेकर बातें ज्यादा होने लगी हैं। यही वो साल था जब नेहरू के नाम को जनता की बहस का मुद्दा बनाया गया था। एक नए सिरे से, एक नए तरीके से। पंडित नेहरू और उनके कार्यों की व्याख्या नए ढंग से होनी शुरू हुई। ये साल था सत्ता से कांग्रेस की विदाई का और भाजपा के आगमन का। भाजपा के आने से ज्यादा ये नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का साल था। नरेंद्र मोदी, जो की इस वक्त भी देश के प्रधानमंत्री हैं और अपने दूसरे कार्यकाल में हैं। राजनीतिक टिप्पणीकार कहते हैं कि नरेंद्र मोदी अपने कई गतिविधियों में जवाहरलाल नेहरू की ही तरह दिखते हैं।

2014 के बाद से जनता के बीच जवाहरलाल नेहरू और नरेंद्र मोदी की तुलना खूब की जाने लगी। सोशल मीडिया पर फॉरवर्ड मैसेज, मीम और ना जाने कितने तरीकों से इस काम को बड़े योजनागत रूप में किया गया। जैसे लगता है कि किसी हेडक्वार्टर से एक संदेश जनता के बीच भेजी गई हो और उस पर बहस शुरू करवाया गया हो। इसमें आईटी सेल की भूमिका से हर कोई परिचित है। कश्मीर से लेकर चीन तक के मुद्दे पर नेहरू और मोदी की तुलना होती रहती है। पंडित जवाहरलाल नेहरू और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते हुए भारत में कई बड़े आंदोलन हुए हैं। दोनों सरकारों के खिलाफ कई बार लोग एकजुट हुए हैं। हालांकि नेहरू और मोदी दोनों के समय और परिस्थिति में जमीन आसमान का फर्क है।

आंध्र आंदोलन और पंडित नेहरू:

आजादी के बाद से ही देश में भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की बहस शुरू हो चुकी थी। कई समितियां बनीं, कई प्रस्ताव आए। लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू इस पक्ष में कतई नहीं थे। वजह एकदम साफ थी। देश का विभाजन। धर्म के आधार पर हिंदुस्तान ने विभाजन का क्रूर मंजर देखा था। पंडित नेहरू को ऐसा लगता था कि अगर भाषाई आधार पर राज्यों का गठन हुआ तो देश की एकता को खतरा होगा। लेकिन इस बीच एक नए राज्य आंध्रप्रदेश की मांग जोर शोर से होने लगी। ये मांग तेलुगू भाषी लोगों द्वारा की जा रही थी। तेलुगू क्षेत्रों में खूब प्रदर्शन हुए। एक बड़ा आंदोलन उठ खड़ा हुआ। जो चाहता था कि तेलुगू भाषी राज्य के रूप में आंध्रप्रदेश का गठन हो। लेकिन पंडित नेहरू इस पर राज़ी नहीं थे। आंदोलन चलता रहा।

इस दौरान 19 अक्टूबर, 1952 का दिन आया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अनुयायी पोट्टी श्रीरामुलू ने इस आंदोलन में भूख हड़ताल का ऐलान कर दिया। 15 दिसंबर को पोट्टी श्रीरामुलू की इस भूख हड़ताल के दौरान मृत्यु हो गई। उनकी मौत में इस आंदोलन की आग में घी का काम किया। हिंसा भड़क उठी। जनभावनाओं को समझते हुए प्रधानमंत्री नेहरू ने आंध्रप्रदेश के गठन की मांग को मंजूर कर लिया। इस तरह एक आंदोलन को तब की सरकार ने शांत कराया था।
(आंध्रप्रदेश के गठन के लिए जो आंदोलन हुआ और उसके आसपास जो राजनीतिक गतिविधियां चल रही थीं उसका इतिहास व्यापक है। यहां सिर्फ एक खाका पेश किया जा रहा है।)

किसान आंदोलन और नरेंद्र मोदी:

वर्तमान समय में केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार यानी की नरेंद्र मोदी की सरकार ने एक कानून बनाया। कानून जिसका संबंध है कृषि और किसानों से। नरेंद्र मोदी सरकार की बहुचर्चित और विवादित तीन कृषि कानून। देशभर के किसान इसके विरोध में खड़े हो गए। वो भी तब से जब यह एक बिल था। बिल पास हो गया और कानून बन गया। एक बड़ा किसान आंदोलन इन तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ आज से लगभग सौ दिन पहले शुरू हो गई। किसान अलग अलग राज्यों से आकर दिल्ली की सीमाओं पर बैठ गए और आज तक बैठे हैं। इनकी मुख्य दो ही मांगे हैं। पहला की नरेंद्र मोदी सरकार इन तीनों कृषि कानूनों को वापस ले ले। दूसरा, सभी किसानों को उनकी फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की संवैधानिक गारंटी दी जाए।

नरेंद्र मोदी सरकार ने इन मांगों को मानने से अब तक इनकार किया है। वो इस कृषि कानून को किसानों के हित में बताने में जुटे हैं। लेकिन इन सौ दिनों के दौरान किसान आंदोलन में कई किसानों की जान चली गई। एकदम सटीक आंकड़ा तो मौजूद नहीं है मगर करीब डेढ़ सौ से अधिक किसानों ने इस आंदोलन में अपनी आहुति दी है। कई किसानों ने कृषि कानूनों और नरेंद्र मोदी सरकार के रवैए के खिलाफ खुदकुशी भी कर ली है। आज भी हरियाणा के एक पचास साल के किसान ने खुद को फांसी लगाकर अपनी जान दे दी है। लेकिन इसके बावजूद नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा है। इतनी मौतों के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीना पसीज नहीं रहा है। नरेंद्र मोदी चुनावी रैलियों में व्यस्त हैं। उन्हें इस बात की तनिक भी फिक्र नहीं कि देश के किसान जान दे रहे हैं। उन्हीं के द्वारा बनाए गए एक कानून के खिलाफ फांसी पर झुल रहे हैं।

यहां दो आंदोलनों को दिखाया गया है। एक जो पंडित जवाहरलाल नेहरू के पीएम रहते हुआ था। एक जो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते हुए हो रहा है। एक पीएम ने भूख हड़ताल में हुई एक मौत के बाद अपना व्यक्तिगत विचार बदल लिया। एक पीएम सैकड़ों मौतों के बाद भी अपनी जिद पर अड़ा है। आगे की व्याख्या और बहस बुद्धिजीवी और सुधी पाठक खुद करें।

(अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।)

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1 comment

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Sumit March 8, 2021 - 2:40 am

Good job Dear

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