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Home कोरोना वायरस शर्म को गौरवगाथा में कैसे करें तब्दील, सीखिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से!

शर्म को गौरवगाथा में कैसे करें तब्दील, सीखिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से!

by Khabartakmedia

बुधवार को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक ट्वीट किया। ट्वीट में एक फोटो साझा की। फोटो महाराष्ट्र के नागपुर में रहने वाले नारायण भाऊराव दाभाडकर की थी। नारायण भाऊराव दाभाडकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बताए जा रहे हैं। शिवराज सिंह चौहान ने अपनी ट्वीट में लिखा कि “मैं 85 वर्ष का हो चुका हूँ, जीवन देख लिया है, लेकिन अगर उस स्त्री का पति मर गया तो बच्चे अनाथ हो जायेंगे, इसलिए मेरा कर्तव्य है कि मैं उस व्यक्ति के प्राण बचाऊं। ऐसा कह कर कोरोना पीडित आरएसएस के स्वयंसेवक श्री नारायण जी ने अपना बेड उस मरीज़ को दे दिया।”

शिवराज सिंह चौहान आगे लिखते हैं कि “समाज और राष्ट्र के सच्चे सेवक ही ऐसा त्याग कर सकते हैं, आपके पवित्र सेवा भाव को प्रणाम! आप समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं। दिव्यात्मा को विनम्र श्रद्धांजलि। ॐ शांति!”

क्या है पूरी घटना:

महाराष्ट्र के नागपुर के रहने वाले 85 वर्षीय नारायण भाऊराव दाभाडकर कुछ दिन पहले कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए थे। संक्रमण का असर उन पर बढ़ने लगा। नारायण भाऊराव का ऑक्सीजन स्तर 60 के नीचे पहुंच गया था। एक अखबार में छपी खबर के मुताबिक नारायण भाऊराव को उनकी बेटी और दामाद ने इंदिरा गांधी शासकीय अस्पताल में भर्ती कराया। यहां उनका इलाज चल रहा था।

नारायण भाऊराव की इलाज अभी चल रही थी। लेकिन इस बीच एक महिला अपने 40 साल के पति को लेकर अस्पताल पहुंचती है। महिला के पति को अस्पताल में भर्ती नहीं मिल रही थी। क्योंकि अस्पताल में बेड खाली नहीं थी। कोरोना महामारी में ये जानलेवा समस्या आम हो चुकी है। खैर, महिला के पति को जब बेड नहीं मिला तो वो रोने लगी। यह सब नारायण भाऊराव देख रहे थे। उनका दिल पसीज गया। उन्होंने अस्पताल प्रशासन से आग्रह किया कि उनका बेड उस महिला के पति को दे दी जाए।

नारायण भाऊराव ने कहा कि “मैंने अपनी जिंदगी जी ली है। मेरी उम्र अब 85 वर्ष हो चुकी है। उस महिला का पति जवान है। उस पर घर की जिम्मेदारियां हैं। इसलिए मेरा बेड उसे दे दिया जाए, मैं घर चला जाऊंगा।” खबर के अनुसार नारायण भाऊराव ने अस्पताल प्रशासन को एक कागज पर लिख कर दिया कि “मैं अपना बेड दूसरे मरीज के लिए स्वेच्छा से खाली कर रहा हूं।” इसके बाद नारायण भाऊराव अपने घर लौट गए। उस महिला का पति उनकी बेड पर भर्ती कर लिया गया।

तीन दिन बाद मौत:

घर लौटने के तीन दिन बाद ही नारायण भाऊराव की मौत हो गई। एक तरह से देखा जाए तो एक 40 साल के आदमी को बचाने के लिए उन्होंने अपनी जान दे दी। इस बात को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गौरव के रूप में पेश किया। यही है शर्म की घटना को गर्व रूप देने की कला। एक बुजुर्ग अस्पताल में बेड की किल्लत से और पर्याप्त इलाज नहीं मिल पाने के कारण मर गया। इस घटना में प्रेरणा तो है। लेकिन सबसे अधिक कुछ है तो काला धब्बा। जो लगा है स्वास्थ्य व्यवस्था पर। ये घटना बता रही है कि एक व्यक्ति का जीवन बचाने के लिए दूसरे को अपनी जान देनी पड़ी।

आरएसएस के संस्कार के नाम पर इस शासकीय शर्म को गौरव में तब्दील कर दी गई। ये घटना भारत के नेताओं और उनकी मानसिकता को परिभाषित करती है।

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