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काशी विद्यापीठ: छात्रसंघ चुनाव प्रचार में नियमों की अनदेखी, प्रशासन सुस्त

by Khabartakmedia

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में छात्र संघ का चुनाव अब अपने आखिरी पड़ाव में पहुंच चुका है। 25 फरवरी को छात्र संघ के अलग-अलग पदों के लिए मतदान होगा। वोटिंग में अब महज दो-तीन दिन का समय ही शेष है। ऐसे में इस बात की पड़ताल करनी जरूरी है कि प्रशासन द्वारा जारी कायदे कानून पर कितना अमल किया जा रहा है? छात्रसंघ के प्रत्याशी विश्वविद्यालय प्रशासन और जिला प्रशासन द्वारा बनाए गए किन नियमों का पालन कर रहे हैं? कितने शर्तों की धज्जियां उड़ाई जा रही? साथ ही प्रशासन कितना मुस्तैद है? प्रशासन अपने ही बातों और शर्तों का पालन करवाने में कितना सफल है?

चुनाव अधिकारी का निर्देश

गौरतलब है कि इस बार छात्रसंघ चुनाव पर संकट के बदल मंडरा रहे थे। प्रशासन का मन इसके खिलाफ था। लेकिन छात्र नेताओं के धरना प्रदर्शन के बाद स्थिति बदल गई। शताब्दी वर्ष महोत्सव के दौरान ही जिला प्रशासन, विश्वविद्यालय प्रशासन आए छात्र नेताओं के बीच बैठक हुई। काफी हंगामे के बाद चुनाव को लेकर अधिसूचना जारी हुई। लेकिन प्रशासन ने छात्र संघ के संभावित उम्मीदवारों के सामने कई शर्तें रखी थीं।

क्या हैं निर्देश?

नामांकन अथवा किसी भी दिन कैंपस से बाहर छात्रसंघ चुनाव से जुड़े प्रचार पर रोक लगाई गई थी। साथ ही चुनाव अधिकारी प्रो. कृपाशंकर जायसवाल की ओर से एक नियमावली जारी की गई थी। जिसमें स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि कोई भी प्रत्याशी किसी प्रकार के छापे हुए कार्ड/पोस्टर/बैनर का इस्तेमाल नहीं करेंगे। इसके बदले हाथ से लिखे हुए पोस्टर/बैनर से प्रचार करने को कहा गया था।

एबीवीपी और एनएसयूआई के प्रत्याशियों का बैनर (फोटो:22/02/2021)

18 फरवरी को चुनाव अधिकारी प्रो. जायसवाल की ओर से जारी एक नोटिस में कैंपस से बाहर किसी भी प्रकार के पोस्टर/होर्डिंग लगाने पर रोक लगाई गई है। नोटिस में कहा गया है कि सभी उम्मीदवार विश्वविद्यालय से बाहर लगे सभी प्रचार सामग्रियों को तत्काल हटवाएं। साथ ही आगे से छात्रसंघ चुनाव प्रचार से जुड़ा कोई भी पोस्टर/होर्डिंग बाहर नहीं लगाएं। इसमें इस बात का भी जिक्र है कि यदि प्रत्याशी इस बात को नहीं मानेंगे तो जिलाधिकारी के निर्देशों के आधार पर चुनाव तिथि के भीतर किसी भी दिन नामांकन रद्द किया जा सकता है।

एबीवीपी और छात्र सभा के उम्मीदवार के होर्डिंग (फोटो:22/02/2021)

क्या है जमीनी हकीकत:

चुनाव अधिकारी अपने नोटिस में काफी सख्त और प्रशासन चाकचौबंद लगती है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। विश्वविद्यालय परिसर के बाहर चारों ओर (सिगरा, कबीर चौरा, रथयात्रा, कैंट) छात्रसंघ प्रत्याशियों के पोस्टर धड़ल्ले से लगे हुए हैं। दीवारों पर पोस्टर चिपकी हुई है। सड़क के डिवाइडर पर पोस्टर चिपके हैं। बड़े बड़े होर्डिंग लगे हुए हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, समाजवादी छात्र सभा और एनएसयूआई सभी के प्रत्याशियों के होर्डिंग अभी भी देखने को मिल रहे हैं।

छात्र सभा के उम्मीदवार का बैनर (फोटो:22/02/2021)

छात्रसंघ अध्यक्ष, महामंत्री, उपाध्यक्ष और पुस्तकालय मंत्री चारों पद के प्रत्याशियों की प्रचार सामग्री विद्यापीठ के बाहर लगे हुए हैं। लेकिन क्या विश्वविद्यालय प्रशासन और जिला प्रशासन दोनों की नजर इस पर नहीं पड़ रही है? या फिर प्रशासन जानबूझकर इन पर ध्यान नहीं दे रहा है? सवाल गंभीर है। क्या ये मान लिया जाए कि ये छात्रसंघ प्रत्याशियों और प्रशासन की मिलीभगत है? लिंगदोह के नियमानुसार छात्रसंघ चुनाव में कोई प्रत्याशी अधिकतम पांच हजार रुपए ही खर्च कर सकता है। तो क्या इतने बड़े स्तर पर प्रचार प्रसार महज पांच हजार रुपए में हो रहा है?

एनएसयूआई के पैनल की पोस्टर (फोटो:22/02/2021)

प्रशासन खुद ही अपने नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए दिख रहा है। 18 फरवरी को चुनाव अधिकारी की ओर से जारी निर्देश महज औपचारिकता लगती है। सोमवार (22/02/2021) को खबर तक मीडिया के कैमरे में कैद ये तस्वीरें इसी बात की गवाही देती हैं। 18 फरवरी को निर्देश दिया गया था प्रशासन की ओर से कि कैंपस के बाहर लगी हर प्रचार सामग्री को प्रत्याशी हटा लें। अन्यथा उनका नामांकन रद्द किया जा सकता है। लेकिन आज तक ये होर्डिंग/बैनर यूं ही लगे हुए हैं और प्रशासन को मुंह चिढ़ा रहे हैं।

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