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हुल दिवस: हिंदुस्तान की पहली सशस्त्र क्रांति, जिसका लक्ष्य आज भी है अधूरा?

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सिद्धू और कान्हू संथाल हुल के अग्रणी नेता थे।

ब्रिटिश हुकूमत से भारत को आजादी खैरात में नहीं मिली थी। इसके लिए लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी थी। अंग्रेजों की जंजीरों को तोड़ने के लिए न जाने कितने वीरों ने अपने सिर कटाए थे। हिंदुस्तान की आजादी के लिए कई आंदोलन हुए। जिनका इतिहास बड़े गौरव के साथ हम पढ़ते, सुनते हैं। इनमें से ही एक महान क्रांतिकारी आंदोलन था संथाल हुल। 30 जून यानी आज संथाल हुल की 166वीं वर्षगांठ है।

हर साल भारत में 30 जून को हुल दिवस के रूप में मनाया जाता है। ये और बात है कि हुल दिवस औपचारिकताओं में ज्यादा है, जमीन पर कम। कहने को इस दिन संथाल हुल के योद्धाओं को याद किया जाता है। उन महान क्रांतिकारियों के सपनों को पूरा करने की कसमें ली जाती हैं। लेकिन यह सब एक कोरी बतोलेबाजी बन गई है।

संथाल हुल के क्रांतिवीरों को याद करने वाले राजनीतिक दल और नेता, उस महान लक्ष्य के विरुद्ध काम करते हैं। जिसे हुल के नेताओं ने तय किया था।

इतिहासकारों के नजरंदाजगी का शिकार संथाल हुल:

भारत में और खासकर उत्तर भारत में आज की पीढ़ी संथाल हुल से अनजान है। उन्हें संथाल हुल के महान इतिहास की जानकारी नहीं है। वजह साफ है। हिंदुस्तान के इतिहासकारों और शिक्षा व्यवस्था ने उस जनक्रांति पर पर्दा डाल दिया। या कहें कि वक्त के साथ जो जाले संथाल हुल के इतिहास पर लगे उन्हें साफ नहीं किया गया। हमें सामान्य ज्ञान से लेकर पाठ्यक्रमों तक में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बारे में बताया जाता है। इतिहासकारों ने इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी है।

हालांकि एक संग्राम 1857 से दो वर्ष पूर्व भी हुआ था। जिसे इतिहासकारों ने अनदेखा किया है। इसे भी आदिवासी विरोधी मानसिकता के उदाहरण के तौर पर देखा जाना चाहिए। क्योंकि इस क्रांति के बारे में जितना जानना चाहिए उतना हम नहीं जानते हैं। स्कूल के दिनों से ही हमें 1857 के स्वाधीनता आंदोलन का पाठ पढ़ाया जाता है। लेकिन 1855 में हुए संथाल हुल से हमारा परिचय तक नहीं हो पाता।

संथाल हुल का इतिहास:

संथाल हुल का इतिहास बहुत व्यापक है। उसे किसी एक लेख में समेट पाना बेहद मुश्किल काम है। हमारी कोशिश है कि इस लेख के जरिए संथाल हुल के इतिहास की ओर एक खिड़की खोली जाए। जिससे आप उस महान क्रांति को देख सकें। उसके बाद खुद अपनी जिम्मेदारी समझते हुए उसकी जड़ों और टहनियों को तलाश करें।

संथाल परगना के साहबगंज के भोगनाडीह गांव में 30 जून, 1855 को आदिवासियों की एक सभा बुलाई गई। इस सभा में तकरीबन चार सौ गांवों के पचास हजार से अधिक आदिवासी इकट्ठा हुए। इस सभा में आदिवासियों के अलावा और भी कई दलित और पिछड़े जातियों के लोग पहुंचे थे। जो आदिवासियों के साथ गोलबंद होने वाले थे।

अत्याचार ने दिया संथाल हुल को जन्म:

ऐसा नहीं है कि किसी रोज संथाल के लोग जागे और क्रांति को तैयार हो गए। क्रांति का जन्म हमेशा से ही शोषण और अत्याचार के गर्भ से हुआ है। इस बार भी कहानी वही। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन था। पूरा देश गुलाम हो चुका हो था। एक एक करके हर आजाद इलाके को अंग्रेज अपनी मुट्ठी में किए जा रहे थे। साथ ही कई प्रकार के कर लगाकर और अन्य प्रकार के अत्याचारों तले लोगों को कुचल रहे थे।

आदिवासी भी इससे अछूते नहीं थे। लेकिन एक तरफ देश के दूसरे हिस्से के लोग आसानी से अंग्रेजों के सामने झुक गए। अंग्रेजी क्रूरता और ताकत के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। लेकिन वहीं दूसरी ओर अपने स्वभाव से आजाद आदिवासियों ने अंग्रेजों और उनके पिट्ठुओं से लड़ाई लड़नी शुरू कर दी। ब्रिटिश हुकूमत के आधुनिक ताकत के सामने आदिवासी अपने पारंपरिक हथियारों के साथ डट गए।

30 जून की ऐतिहासिक सभा:

तमाम तरह के अत्याचारों और शोषणों से क्षुब्ध होकर संथाल के आदिवासियों ने 30 जून को भोगनाडीह में वो सभा बुलाई जिसमें पचास हजार से अधिक आदिवासी जुटे। इस सभा में संथाल के लोगों ने खुद को आजाद घोषित कर दिया। उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी से इनकार कर दिया। इसी सभा में सिद्धू मुर्मू को लोगों ने अपना राजा घोषित किया। सिद्धू मुर्मू के सहोदर भाई कान्हू मुर्मू सलाहकार बने।

सिद्धू और कान्हू संथाल हुल के अग्रणी नेता थे। इनके दो भाई और थे चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू। इनकी दो बहनें भी थीं फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू। ये सभी लोग संथाल हुल का नेतृत्व कर रहे थे। इनके साथ हजारों की संख्या में आदिवासी और दूसरी दलित जातियों के लोग भी शामिल थे।

देखा जाए तो संथाल हुल भारत में होने वाली पहली सशस्त्र क्रांति थी। पहला ही छापामार युद्ध। अंग्रेजों, साहूकारों, पुलिस और अन्य सरकारी तंत्र आधुनिक हथियारों से लैस था। जबकि उनके सामने आदिवासी पारंपरिक तीर धनुष से लड़ाई लड़ रहे थे। फिर भी इन पर काबू पाना अंग्रेजों के लिए आसान काम नहीं था।

इनाम के लालच में मुखबिरी:

30 जून को हुई सभा के बाद पुलिस ने सिद्धू और कान्हू की गिरफ्तारी का वारंट निकाला। एक दरोगा इन्हें गिरफ्तार करने गांव पहुंचा तो लोगों ने उसका सिर ही काट दिया। अंग्रेज समझ चुके थे कि इन्हें ऐसे पकड़ना मुमकिन नहीं। तो इनाम का जाल बिछाया गया।

सिद्धू और कान्हू का पता देने के लिए 10,000 का इनाम घोषित किया गया। चाल कामयाब हुई। आदिवासियों में से ही किसी अपने ने इनाम के लालच में सिद्धू और कान्हू को गिरफ्तार करवा दिया। 26 जुलाई, 1855 को दोनों क्रांतिकारियों को भोगनडीह गांव में एक बरगद के पेड़ से लटकार मार दिया गया। इस तरह हिंदुस्तान के पहले सशस्त्र क्रांति के अग्रणी नेताओं ने अपनी आजादी के खातिर शहीद हो गए।

सिद्धू और कान्हू से पहले ही 10 जुलाई को चांद और भैरव की भी हत्या कर दी गई थी।

अधूरा है संथाल हुल का सपना:

166 वर्षों बाद भी संथाल हुल का सपना पूरा नहीं हो सका है। अंग्रेजों के रहते तो वो ख्वाब कभी पूरे हो ही न सके। लेकिन अंग्रेजों के जाने के लगभग 74 साल बाद भी वो लक्ष्य हासिल न किया जा सका। बल्कि जिन परिस्थितियों के चलते संथाल हुल हुआ था वो और भी गहरी हो चुकी हैं।

आए दिन झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों से शोषण और क्रूरता की खबरें सामने आती रहती हैं। लगातार आम आदिवासी सुरक्षा बलों के गोली के शिकार हो रहे हैं। उन्हें नक्सली और माओवादी बताकर मारा जा रहा है।

जिस जल जंगल जमीन की रक्षा के लिए संथाल हुल हुआ था आज उस पर संकट के बदल और भी गहरे हो चुके हैं। जंगल और पहाड़ों को पूंजीपतियों के हाथों धड्डले से बेचा जा रहा है। खनन के लिए जंगल काटे जा रहे हैं। विकास परियोजनाओं का चोला ओढ़कर आदिवासियों को उनके निवास स्थान से विस्थापित किया जा रहा है।

छत्तीसगढ़ में बस्तर के आदिवासी अपनी अस्मिता के लिए आंदोलन कर रहे हैं। वहां कांग्रेस की सरकार है। केंद्र में भाजपा की सरकार है। दोनों ने आदिवासी विरोधी नीतियां अपनाई हैं। झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार है। जो आदिवासी हितों के लिए आंदोलन करते रहे हैं। लेकिन सत्ता में आने के बाद हेमंत सोरेन ने भी आदिवासी समुदाय के लोगों को निराश किया है।

अंदर ही अंदर वही परिस्थितियां बन चुकी हैं जिनमें कभी संथाल हुल का जन्म हुआ था।

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