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क्या है खाप पंचायत? किसान आंदोलन में खूब हो रहा जिक्र

by Khabartakmedia

एक शब्द आजकल खबरों में खूब पढ़ने और सुनने को मिल रहा है। खाप और खाप पंचायत। किसान आंदोलन में अब हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में हर दिन खाप पंचायतें हो रही हैं। किसान आंदोलन में बड़े नेता बनकर उभरे राकेश टिकैत भी इन खाप पंचायतों में पहुंच रहे हैं। मीडिया खाप पंचायतों की खबरें दिखा रही है। इन पंचायतों में कृषि कानून और किसान आंदोलन पर विचार विमर्श हो रहा है।

आखिर ‘खाप’ है क्या? ग्राम पंचायत तो हर किसी ने सुना है। लेकिन खाप पंचायत क्या होती है? खाप, एक सामाजिक ढांचा है। एक परंपरागत रवायत। जहां किसी गांव और बिरादरी के लोग एकजुट होकर किसी मुद्दे पर बहस करते हैं। ये मामले अक्सर सामाजिक ही होते हैं। सरल भाषा में कहा जाए तो एक जातिगत संगठन की तरह खाप पंचायत काम करता है। बहुत से गांवों को मिलाकर एक खाप बनता है। इसमें चार गांव भी हो सकते हैं और तीस गांव भी। खाप पंचायतों में इन गांवों के किसी भी मसले पर बातचीत होती है। फिर खाप के मुखिया लोग एक फैसला सुनाते हैं। फैसला, खाप में शामिल हर गांव के लोगों को मानना होता है।

एक खाप पंचायत (फोटो: livemint)

एक उदाहरण से खाप पंचायत के फैसलों को समझिए। मान लीजिए कि एक लड़का और एक लड़की अपनी मर्जी से शादी करना चाहते हों। दोनों वयस्क हों। हर संवैधानिक स्थिति दोनों की शादी के लिए उनके हक में हो। लेकिन अगर गांव के लोगों को किसी वजह से यह मंजूर ना हो। तब खाप पंचायत बुलाई जाएगी। खाप में इस पर बहस होगा। अंत में खाप अपना फैसला सुनाएगा। यदि खाप ने कह दिया कि दोनों की शादी नहीं होगी। तब वे शादी नहीं कर सकते। इसके बावजूद अगर उन दोनों ने शादी की तो इस पर उन्हें दंड भी मिल सकता है। जाति बहिष्कार और गांव से निकला भी जा सकता है।

कहा जाता है कि ‘खाप’ दो शब्दों से मिलकर बना होता है। ‘ख’ और ‘आप’। यहां ख का अर्थ आकाश से लगाया जाता है, जबकि आप का मतलब जल है। इस तरह खाप माने “ऐसा संगठन जो आकाश की तरह सर्वोपरि हो और जल की भांति स्वच्छ और निर्मल हो।” उत्तर भारत में खाप व्यवस्था का एक लंबा इतिहास है। देहाती इलाकों के लोग इसी ढांचे के तहत अपने मसलों को सुलझाते हैं। हालांकि इन्हें कोई संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है।

फोटो: sentinelassam.com

संवैधानिक स्थिति:

खाप पंचायतों को संविधान में कोई जगह नहीं दी गई है। संविधान में ग्राम पंचायत की व्यवस्था दी गई है। खाप पंचायत अक्सर रूढ़ियों पर चलते हैं। ये और बात है कि आज तक ये वजूद में हैं। हालांकि इनका दबदबा जरूर कम हो गया है। कह सकते हैं कि लगभग समाप्त हो चुका है। जाट राजनीति के धुरी के रूप में खाप को देखा जाता है। यहां जाटों का वर्चस्व खूब होता है। इनका दावा है कि सामाजिक बनावट को बनाए रखने के लिए खापों का अस्तित्व में रहना जरूरी है। लेकिन इन पर रूढ़िवादी और अंधविश्वासी होने का आरोप लगता रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स बताते हैं कि खाप के फैसले महिलाओं के लिए ज्यादा घातक होते हैं। महिलाओं के अधिकारों को रूढ़िवादी विचारों की वजह से दबा दिया जाता है। महिलाओं के प्रति हिंसा और हत्या तक के मामले सामने आए हैं।

किसान आंदोलन से जागे खाप!

किसान आंदोलन के कारण एक बार फिर से खाप पंचायतें लोगों के सामने उभरकर आई हैं। पिछले एक दो दशकों में इनमें तेजी से गिरावट आई है। क्योंकि एक वैज्ञानिक सोच और प्रगतिशील युवा वर्ग वजूद में आया है। लेकिन किसान आंदोलन ने एक एक बार फिर से खाप व्यवस्था को ऐसा लगता है कि उठाकर खड़ा कर दिया है। किसानों की पंचायतें हो रही हैं। महापंचायत बुलाई जा रही हैं। किसान नेता मंचों से भाषण दे रहे हैं और किसान आंदोलन को गांव गांव तक पहुंचाने की जुगत में लगे हुए हैं। लेकिन देखना होगा कि किसान आंदोलन के बाद खाप पंचायत क्या रूप अख्तियार करता है। क्या एक संस्था के रूप में खाप मजबूती से स्थापित हो सकेगा?

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