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क्या लोकतंत्र की छाती पर हो रहा है पश्चिम बंगाल का चुनाव?

by Khabartakmedia

पश्चिम बंगाल “लोकतंत्र के त्योहार” में पूरी तरह मग्न है। चुनावी माहौल का पारा नई ऊंचाइयों को छू रहा है। रैलियों का रेला लगा हुआ है। वादों की बयार बह रही है। आरोप प्रत्यारोप की रेस चल रही है। ऐसा नहीं है कि विधानसभा चुनाव सिर्फ बंगाल में ही हो रहा है। इसके साथ ही अन्य चार महत्वपूर्ण राज्यों में भी विधानसभा के चुनाव होने हैं। जिनमें केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और असम शामिल हैं। लेकिन मीडिया से लेकर जनता के बीच की बहसों तक में बंगाल ही छाया हुआ है।

वैसे तो पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी समेत कुछ अन्य राजनीतिक दल मैदान में हैं। लेकिन हर किसी की नजरें तृणमूल और भाजपा पर टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि यही दो दलें मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं। टक्कर वर्तमान समय में भारत की इकलौती महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अपने सियासी शक्ति के शीर्ष पर बैठे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच है। मीडिया ने इसे लेकर “दीदी बनाम दादा” की टैगलाइन भी बना दी है। एक तरफ दीदी ने “खेला होबे” कहकर एक लहर पैदा कर दी है तो दूसरी ओर दादा “सोनार बांग्ला” के नारे से अपने पक्ष में हवा बहाने की जुगत कर रहे हैं।

खबर तक मीडिया की टीम पिछले दिनों बंगाल के चुनाव यात्रा पर गई थी। ये यात्रा पांच दिनों तक बंगाल के कुछ अलग अलग इलाकों में घूमने के बाद पूरी हुई। मीडिया और बंगाल के बाहर इस चुनाव के जिन सवालों पर माथापच्ची चल रही है, उन्हें जमीन पर तलाशने की कोशिश की। कुछ ऐसे भी पहलू देखने को मिले जो आमतौर पर दिख नहीं रहे हैं। या जिन्हें लेकर बहुत बहस नहीं हो रही है। और इन सब में शामिल है लोगों में फैला भय और हिंसा का डर। जो बताती है कि ये चुनाव लोकतांत्रिक मूल्यों को हचड़ कर हो रही है।

पश्चिम बंगाल के लोगों का एक बड़ा हिस्सा भय के साथ इस चुनावी समर में समय काट रहा है। बिहार और यूपी में जिस तरह चौक चौराहों और चाय की दुकानों पर राजनीतिक बहस होती है, वैसा नजारा बंगाल में नाम मात्र भर ही है। यूपी बिहार की तरह यहां इतना आसान नहीं किसी नेता के पक्ष में और किसी के खिलाफ बोलना। बंगाल के लोग कैमरे के सामने बोलने से कतरा रहे हैं। उन्हें डर है कि अगर किसी पार्टी के विरोध में कोई बात कह दिया तो शामत आ जाएगी। यदि किसी पार्टी या नेता के पक्ष में कुछ दिया तो विरोधी खेमा नाराज हो जाएगा। जिसकी कीमत काफी महंगे दर पर चुकानी पड़ेगी। ये बातें किसी एक पार्टी के लिए नहीं हैं। भाजपा और टीएमसी के कैडर का दहशत लोगों में बुरी तरह घर किए हुए है।

पश्चिम बंगाल में खबर तक मीडिया की टीम पहले दिन हावड़ा पहुंची थी। वहां का एक किस्सा इन बातों की तस्दीक करता है कि बंगाल का राजनीतिक माहौल आम लोगों के लिए कितना ख़तरनाक रूप धारण किए हुए है। हावड़ा स्टेशन से कुछ ही दूरी पर एक डाॅबसन नामक इलाका है। यह उत्तरी हावड़ा विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है। यहां से टीएमसी के प्रत्याशी हैं गौतम चौधरी और भाजपा के उम्मीदवार हैं उमेश राय। डाॅबसन में ठहरने के लिए बहुत से होटल/लॉज एक कतार में मौजूद हैं। यहां हर एक होटल पर टीएमसी और भाजपा दोनों ही दलों का झंडा लगा हुआ था।

वहीं एक चाय की छोटी सी दुकान है। दुकान पर 5-6 लोग खड़े थे। हमने बड़ी उत्सुकता के साथ एक व्यक्ति से पूछा कि हर दुकान पर दोनों पार्टियों के झंडे क्यों लगे हैं? ये झंडे किसने लगाए हैं? जवाब मिला कि “दोनों दलों के कार्यकर्ताओं ने लगा दिए हैं।” बड़ा अचंभा हुआ। फिर सवाल किया। समर्थक तो किसी एक के ही होंगे न तो दोनों के झंडे क्यों? जवाब आया, “हां वोट तो एक ही को देंगे लेकिन अब झंडा लगा दिया है।” ये जवाब पूरा नहीं था। तो पूछ लिया कि ऐसा है तब किसी एक का झंडा हटा देते या दोनों का ही हटा देते? अबकी बार जवाब हैरान और परेशान करने वाला था। जवाब मिला, “दादा देखो हमें शांति से रहना है। झंडा हटाने के बदले में मरना नहीं है। क्या चाहते हो घर में आग लगवा लें?”

यहां हर इलाके का लगभग एक जैसा ही हाल है। लोग थोड़ा बहुत भरोसा दिलाने पर ऑफ कैमरा हर समीकरण समझाएंगे। हर नेता की बात बताएंगे। लेकिन गिने चुने लोग ही ऑन कैमरा आकर बोलने को तैयार होते हैं। दस में से 2-3 लोग ही कैमरे के सामने खुलकर बोलने को राजी होते हैं।

अब ऐसे में सवाल है कि क्या बंगाल का चुनाव लोकतंत्र को मजबूत करने वाला साबित हो सकेगा? क्या गैर लोकतांत्रिक व्यवहारों वाला ये चुनाव लोकतंत्र के हित में निष्कर्ष तक पहुंचेगा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हमेशा मंजिल से ज्यादा उस तक पहुंचने वाले रास्ते पर जोर दिया करते थे। चुनाव के दौरान स्वतंत्र और निर्भीक माहौल की कमी किस ओर इशारा कर रही है ये बड़ा सवाल है।

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