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विचार: Stan Swamy की मृत्यु सत्ता की बनाई हुई पोस्टर है, जिसे दिखाकर हर आजाद आवाज को डराया जाएगा!

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84 साल के स्टेन स्वामी (Stan Swamy) गुजर गए। सत्ता, न्याय व्यवस्था और जनता की चुप्पी से लड़ते-लड़ते आखिरकार स्टेन स्वामी इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गए। Holy Family Hospital में वेंटिलेटर पर रहते हुए उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन इसे स्वास्थ्य कारणों से देखा जाना उतनी ही नाइंसाफी होगी जितनी नाइंसाफी खुद स्टेन स्वामी ने झेली थी।

पहले मसला समझिए कि आखिर स्टेन स्वामी की मौत ने हर लोकतांत्रिक विचार रखने वाले व्यक्ति को झकझोर क्यों दिया है? स्टेन स्वामी पिछले एक साल से जेल में बंद थे। उन पर Unlawful Activities Prevention Act (UAPA) की संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज था।

साल 2017 के एकदम आखिरी दिन हुए भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में स्टेन स्वामी गिरफ्तार किए गए थे। उन पर और उन जैसे कई सामाजिक कार्यकर्ताओं पर आरोप था कि एल्गर परिषद की बैठक में दिए गए भाषणों ने हिंसा को उकसाया। यानी कि यहां भड़काऊ भाषण दिए गए। जिससे हिंसा हुई। आगजनी हुई। एक व्यक्ति की मौत भी।

भीमा कोरेगांव मामले की जांच NIA कर रही है। NIA ने इसी मामले में स्टेन स्वामी को पिछले साल झारखंड से गिरफ्तार किया था। स्टेन स्वामी पर आरोप है कि उनके संबंध नक्सलियों और खासकर CPI (माओवादी), जिस पर भारत में प्रतिबंधित लगा है, से हैं।

बहरहाल स्टेन स्वामी गिरफ्तार हुए। उन्हें तलोजा जेल में रखा गया। स्टेन स्वामी की तबियत बिगड़ी हुई रहती थी। क्योंकि उम्र का तकाजा था। जेल में रहते के दौरान उनके साथ अच्छे सुलूक नहीं हुए। उन्हें जरूरी सुविधाएं मुहैया नहीं कराई गई। यहां तक स्वास्थ्य संबंधी व्यवस्था भी नहीं मिली।

स्ट्रॉ के लिए तड़पे स्टेन स्वामी:

स्टेन स्वामी को पार्किंसन था। उनका हाथ कांपता था। हाथ से उठाकर किसी भी बर्तन में पानी पीने में दिक्कत होती थी। इसलिए उन्होंने स्ट्रॉ (पानी/जूस या तरल पदार्थ पीने वाली पाइप) की मांग की। जेल में उन्हें स्ट्रॉ नहीं दी गई। तब स्टेन स्वामी की ओर से अदालत में एक स्ट्रॉ उपलब्ध कराने के लिए अर्जी लगाई गई।

इस मसले पर सुनवाई और फैसले के लिए अदालत ने बीस दिन का वक्त लगाया। 20 दिनों बाद अदालत ने जेल प्रशासन को आदेश दिया कि स्टेन स्वामी को स्ट्रॉ दे दी जाए। क्या ऐसा सोचा जा सकता है? याद कीजिए टीवी एंकर अर्णव गोस्वामी के मामले को विशेष बताते हुए न्यायालय ने कितनी जल्दी सुनवाई की थी। खुद ही खोजिए गूगल पर इस चीज को।

भय का पोस्टर:

स्टेन स्वामी की मृत्यु कोई साधारण मौत नहीं है। ये सत्ता द्वारा की गई हत्या से कम नहीं। जिसमें एक 84 वर्षीय बुजुर्ग व्यक्ति को बगैर किसी सबूत जबरन जेल में ठूंस दिया गया। बिना किसी पुख्ता सबूत के एक वृद्ध पर UAPA जैसी अलोकतांत्रिक धाराएं लगा दी गईं। एक अस्वस्थ व्यक्ति को समय पर इलाज तक मयस्सर नहीं हुआ।

हालांकि स्टेन स्वामी की ओर से बॉम्बे हाईकोर्ट में एक अपील दायर की गई थी। जिसमें 28 मई को उच्च न्यायालय ने स्टेन स्वामी को अस्पताल में भर्ती कराने का आदेश दिया था। उसी के बाद वो Holy Family Hospital में ले जाए गए थे।

स्टेन स्वामी की मृत्यु भाजपा के क्रूर सत्ता द्वारा बनाई गई पोस्टर। जिसे मीडिया और आईटी सेल के जरिए इस देश के हर उस कोने में चस्पा किया जाएगा जहां आवाज उठाने वाले लोग मौजूद हैं। जिस कोने में भी लोग सरकार के खिलाफ या उसके सामने सिर उठाने की कोशिश करेंगे उन्हें यही पोस्टर दिखाया जाएगा।

हर बुलंद होती आवाज को यह बात बताई जाएगी कि कैसे सरकार ने एक मानवाधिकार कार्यकर्ता को जेल में ठूंसकर मार डाला। नौजवानों के सामने दिन रात इस पोस्टर का प्रदर्शन किया जाएगा। ताकि कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में लोकतांत्रिक विचारों को आत्मसात करती आवाजें बंद की जा सके।

हर सामाजिक कार्यकर्ता, महिला कार्यकर्ता के सामने ये किस्सा परोसा जाएगा। ताकि कोई भी बोलने की हिम्मत न कर सके। सरकार से सवाल करने की ताकत न जुटा सके।

स्टेन स्वामी की मृत्यु सिर्फ उनकी मृत्यु नहीं है। ये इस देश के हर उस लोकतांत्रिक आवाज की मृत्यु है जो किसी के अधिकार की रक्षा के लिए उठती है। जो सरकार के सामने डट कर खड़ी हो जाती है। ये सत्ता द्वारा बेहद कलाकारी से तैयार की गई वो पोस्टर है जो इस देश की हर आजाद आवाज के ऊपर चिपका दी जाएगी।

:आकाश कुमार

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