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फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह ने पूरी की जिंदगी की दौड़, अलविदा

by
Milkha Singh

Flying Sikh Milkha Singh. फ्लाइंग सिख के नाम से दुनिया भर में मशहूर दिग्गज धावक मिल्खा सिंह का निधन हो गया। शुक्रवार (18 जून) को 91 वर्ष की उम्र में मिल्खा सिंह ने अपनी अंतिम सांस ली। उनके लिए जीवन की यह लंबी दौड़ समाप्त हो गई। Covid-19 के बाद हुई समस्याओं से वे जूझ रहे थे। पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) में उनका इलाज चल रहा था।

मिल्खा सिंह की तबियत लंबे समय से बिगड़ी हुई थी। पिछले महीने के 19 तारीख को उन्हें कोरोना का संक्रमण हो गया था। उसके बाद वे होम आइसोलेशन में ही थे। लेकिन स्थिति नाजुक होने पर 24 मई को उन्हें मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसी महीने 3 तारीख को फोर्टिस से उन्हें PGIMER लाया गया था।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने दी श्रद्धांजलि:

भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह के निधन पर दुख व्यक्त किया। राष्ट्रपति ने ट्वीट कर कहा है कि “स्पोर्टिंग आइकन मिल्खा सिंह के निधन से मेरा दिल दुख से भर गया है। उनके संघर्षों की कहानी और चरित्र की ताकत भारतीयों की पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। उनके परिवार के सदस्यों और अनगिनत प्रशंसकों के प्रति मेरी गहरी संवेदना है।”

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी मिल्खा सिंह के निधन पर शोक जताया। उन्होंने ट्विटर पर लिखा है कि “अभी कुछ दिन पहले ही उनसे मेरी बात हुई थी। मुझे नहीं पता था कि यह हमारी आखिरी बातचीत होगी।”

हर कोई आज इस खबर से आहत है। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, भारतीय सेना, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, पूर्व भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर, मशहूर फुटबॉलर सुनील छेत्री और ऐसे कई बड़े लोगों ने मिल्खा सिंह के निधन पर शोक जाहिर किया है।

दिग्गज धावक मिल्खा सिंह का जीवन और उनके संघर्ष की कहानी किसी रनिंग ट्रैक से बहुत लंबी है। इतनी लंबी की उसे एक बार में समेटा भी नहीं जा सकता है। मिल्खा सिंह का जन्म 20 नवंबर, 1928 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के गोविंदपुरा में हुआ था। उन्होंने भारतीय सेना में रहते हुए देश की सेवा की। फिर यहीं से एथलीट के क्षेत्र में जाकर दुनिया भर में हिंदुस्तान का नाम रौशन किया।

400 मीटर की दौड़ में मिल्खा सिंह ने एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीता। 1956, 1960 और 1964 के ओलंपिक खेलों में उन्होंने भारत का नेतृत्व किया। खेल के क्षेत्र में उनके ऐतिहासिक योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से नवाजा गया।

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