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“रचना सत्ता का प्रतिपक्ष है”

by Khabartakmedia

हिन्दी की विरासत का एक ऐसा मुखर और प्रतिबद्ध रचनाकार कोविड से काल कवलित हुआ जिसने अपने लेखन कर्म से हाशिए के लोगों की आवाज़ बनकर यह मजबूत भरोसा पैदा किया था कि रचना सत्ता का प्रतिपक्ष है। 24 अप्रैल तड़के हिन्दी साहित्य के शलाका पुरुष रमेश उपाध्याय का दिल्ली में कोविड से देहावसान हो गया। रमेश जी की उम्र उनासी वर्ष की थी। 01 मार्च 1942 को उत्तर प्रदेश के एटा में जन्मे रमेश जी हिन्दी के बड़े लेखक थे।
क्या संयोग है कि साहित्य की अनेक विधाओं समेत पत्रकारिता और सम्पादक के रूप में अपनी रचनाधर्मिता को प्रकट करने वाले रमेश जी का जन्मस्थान एटा, उन अमीर खुसरो का भी जन्मस्थान है जिन्हें खडी बोली हिन्दी का आदि रचनाकार होने का गौरव प्राप्त है। अमीर खुसरो भी बहुभाषी और आला दर्जे के रचनाकार थे, जिनकी कलम ने साहित्य, इतिहास, संगीत आदि अनेक विधाओं को सम्पन्न किया था।

रमेश जी के लेखन का भी परिदृश्य बहुआयामी है। उनका पहला कहानी संग्रह 1969 में प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक था ‘जमी हुई झील’ और इसके बाद उनके अठारह कहानी संग्रहों ने हिन्दी पाठकों के बीच अपनी ख़ास जगह बनायी। अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षों में ‘सारिका’ में उनका एक कॉलम चला करता था- ‘किसी देश के किसी शहर में’। वह कथा-लेखन की युक्तियों पर केंद्रित कॉलम था। जिसने उस दौर के अनेक कथाकारों और सर्जकों को प्रभावित किया। बाद के वर्षों में उनका कथा लेखन और उनका वैचारिक हस्तक्षेप अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उनकी आस्था उत्कट रूप से जनवादी मूल्यों में रही और उनका भरोसा उत्तर सोवियत काल में साम्यवादी दुर्गों के ध्वंस के बावजूद डगमगाया नहीं।

रमेश जी बहुत सारे लोगों की तरह सिर्फ़ लिखने में नहीं, लेखन को संघर्ष के दूसरे मोर्चों से जोड़कर चलने में भी भरोसा रखते थे। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा, “मैं जनतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखता हूँ। मतलब आज़ादी, बराबरी, भाईचारा। जब मुझे लगता है कि इन पर कोई संकट है तो मुझे लगता है कि मेरे ऊपर भी वो खतरा है, क्योंकि मैं इन चीजों में विश्वास रखता हूँ। तो मेरी आज़ादी भी खतरे में पड़ती है। मेरी जो बराबरी की भावना है, भाईचारे की भावना है, उस पर भी खतरे हैं, तो ये चीज़ें मुझे सबसे अधिक प्रेरित करती हैं। दूसरा, मनुष्य के दुख की बात कहीं आती है तो वहाँ भी मैं यह सोचता हूं कि यह क्यों है और कैसे इसे समाप्त किया जा सकता है। यही मेरे लेखन के सरोकार हैं। आप इन्हें सामाजिक सरोकार कह सकते हैं।’

यह अनायास नहीं था कि वे लेखक संगठनों से भी जुड़े। वे जनवादी लेखक संघ के संस्थापकों में एक थे। मुखर इतने कि लेखक संगठनों के क्षरण पर चिंता भी जताते रहे। कहानी, उपन्यास, आलोचना, नाटक और सम्पादन के सरोकारों से अपने अंतिम समय तक जुड़े रमेश उपाध्याय ने सत्तर से अधिक किताबों का लेखन और सम्पादन किया। उन्होंने ‘कथन’ जैसी पत्रिका अपने आंदोलनधर्मी स्वभाव के अनुरूप निकाली। उन्होंने भूमंडलीय यथार्थवाद पर अनेक किताबें लिखीं। 2008 में `साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ और 2014 में लिखी ‘भूमंडलीय यथार्थ की पृष्ठभूमि’ के द्वारा उन्होंने उदारीकरण के पूरे दौर को प्रश्नांकित किया। उन्होंने शब्द-संधान जैसे प्रकाशन संस्थान की शुरुआत कर जनबौद्धिकों की अध्ययन सामग्रियों की ऊर्वर ज़मीन तैयार की।

किसी लेखक की पहचान इससे भी तय होती है कि वह अँधेरे समय में रोशनी की उम्मीदों को पैदा करने के लिए पाठक समुदाय को बाखबर कैसे करता है। रमेश उपाध्याय ने मिशनरी भूमिका का निर्वाह करते हुए ‘आज के सवाल’ जैसी महत्वपूर्ण शृंखला का संपादन किया। बत्तीस पुस्तिकाओं की शृंखला में शामिल किताबों के शीर्षक बताते हैं कि क्यों प्रतिबद्ध लेखक बेचैन और चौकन्ना रहता है- सामाजिक न्याय की अवधारणा, नयेपन की अवधारणा, यूटोपिया की ज़रूरत, आशा के स्रोतों की तलाश, विकल्प की अवधारणा, आज का स्त्री आन्दोलन, परिवार में जनतंत्र, विज्ञान और वैज्ञानिकता, संस्कृति और व्यवसायिकता, सांस्कृतिक सम्राज्यवाद, भाषा और भूमंडलीकरण, उत्पादक श्रम और आवारा पूंजी आदि। उन्होंने गुजराती, अंग्रेजी और पंजाबी से अनेक किताबों का अनुवाद करते हुए यह स्पष्ट किया कि भारतीय मन की बहुभाषिक चेतना कैसे ऊर्वरता को सम्भव करती है।

रमेश उपाध्याय ताउम्र जन-संघर्ष को सम्मान देते रहे। जब सोशल मीडिया का दौर आया तो उन्होंने ख़ुद को इस समय के अनुरूप भी तैयार किया। वे फेसबुक पर बिल्कुल युवाओं की तरह सक्रिय थे और पुरानी पीढी से युवा पीढी तक संवाद के रास्ते सम्भव करते रहे। ‘मन की बात वाले’ निर्लज्ज प्रहसन के दौर में हिन्दी का यह प्रतिबद्ध लेखक सोशल मीडिया के मोर्चे पर भी एकतरफा संलाप की जगह अपने स्वभाव के अनुरूप पारस्परिक संवादों की एक शृंखला को सम्भव किया जिसमें वे समूह धर्मी चेतना का मजबूत और जागरूक विकल्प पेश करते रहे।

लेखक: निरंजन सहाय

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