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रेमेडेसिविर इंजेक्शन के काले कमाई की कहानी, रूह कांप जाएगी

by Khabartakmedia

भारत इस वक्त एक भयानक महामारी से जूझ रहा है। कोविड-19 पूरे देश के लिए एक त्रासदी बनकर उभरी है। भारत में हर रोज अब दो ढाई लाख से अधिक मरीज मिल रहे हैं। ऐसे में जाहिर है कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है। अस्पताल में जगह नहीं है। ऑक्सीजन की भारी किल्लत है। इस महामारी में एक दवाई और है जिसकी मांग हर तरफ है। एक इंजेक्शन जिसे कोरोना मरीजों को दी जा राही है। नाम है रेमेडेसिविर।

रेमेडेसिविर इंजेक्शन की मांग इतनी बढ़ चुकी है, अब वह भी दुर्लभ हो चुका है। आसानी से रेमेडेसिविर इंजेक्शन मिल पाना संभव नहीं है। यहां तक कि अस्पतालों में भी यह उपलब्ध नहीं है। रेमेडेसिविर की व्यापक मांग और भारी किल्लत ने कालाबाजारी को आमंत्रित किया है। ब्लैक मार्केटिंग को खुला प्रोत्साहन मिल रहा है। उत्तर प्रदेश का वाराणसी भी इन सब से अछूता नहीं है। वाराणसी में एक व्यक्ति को रेमेडेसिविर इंजेक्शन की बेहद जरूरत आन पड़ी। हर तरकीब अपनाने पर भी जब रेमेडेसिविर नहीं मिला तो उसने ब्लैक से खरीददारी की।

यह कहानी है वाराणसी के जीशान आलम की है। 32 वर्षीय जीशान आलम वाराणसी में एक दवाई दुकान के मालिक हैं। कुछ दिन पहले जीशान, उनकी मां और उनके दोस्त की तबियत बिगड़ गई। तीनों ने एक अस्पताल में चेस्ट की सीटी स्कैन कराई। (जीशान की मां 52 साल की हैं और उनका दोस्त 32 वर्ष का है।) सीटी स्कैन की रिपोर्ट सामान्य नहीं थी। उनके फेंफड़ों की स्थिति, उनके कोविड संक्रमित होने की ओर इशारा कर रहा था। लेकिन उन्होंने कोविड की जांच नहीं कराई। जीशान का कहना है कि “यदि हम कोरोना टेस्ट कराने जाते तो बहुत देर हो सकती थी और हमारे किसी मरीज की जान भी जा सकती थी।” क्योंकि वाराणसी में कोविड की जांच भी मुश्किल से हो पा रही है। इसमें काफी समय लग रहा है। डाक्टर की सलाह पर तीनों वाराणसी के पिशाच मोचन स्थित Alliance Hospital में भर्ती हो गए।

अस्पताल में भर्ती होने के बाद उन्हें रेमेडेसिविर इंजेक्शन की जरुरत पड़ी। उन्हें ये इंजेक्शन लगाना था। अस्पताल में रेमेडेसिविर उपलब्ध नहीं थी। जीशान ने कई तरीकों से रेमेडेसिविर का इंतेजाम करना चाहा। लेकिन बात नहीं बन सकी। जीशान को रेमेडेसिविर के कुल 18 छोटी शीशियों की जरूरत थी। रेमेडेसिविर नहीं मिल पाने की घटना पर जीशान बहुत अचंभे के साथ कहते हैं कि “मैं दवाई के कारोबार से जुड़ा हूं फिर भी मुझे रेमेडेसिविर नहीं मिल पा रहा था।”

जब हर रास्ता बंद हो गया तब एक राह ही बची थी। वो रास्ता था रेमेडेसिविर को ब्लैक से खरीदना। जीशान अपने “एक दोस्त” के माध्यम से रेमेडेसिविर को ब्लैक तरीके से बेचने वालों के संपर्क में आए। जिसके बाद लखनऊ से ये इंजेक्शन खरीद कर आई। रेमेडेसिविर इंजेक्शन की एक शीशी (100 mg) की कीमत 13 हजार रुपए देनी पड़ी। जीशान ने कुल एक दर्जन शीशियां मंगाई और बदले में 1 लाख 68 हजार रुपए दिए। बता दें कि रेमेडेसिविर की एक शीशी (100 mg) फिलहाल लगभग 900 रुपए में मिल रही है। माने कि, 900 रुपए की एक इंजेक्शन 13 हजार रुपए में ब्लैक से खरीदनी पड़ी। ये जानकारी देते हुए जीशान कहते हैं कि “चाहे जितना भी पैसा लगा लेकिन मुझे रेमेडेसिविर मुझे मिल गई। लेकिन गरीब लोग इसे कैसे खरीद पाएंगे।”

जीशान, उनकी मां और उनके दोस्त तीनों फिलहाल स्वस्थ्य हैं। तीनों अस्पताल में ही हैं। उन्होंने अपनी पूरी कहानी खबर तक Media के साथ साझा की। हालांकि उन्होंने इस बातचीत लखनऊ के उस “ब्लैक सोर्स” और मध्यस्थ दोस्त के बारे में स्वाभाविक तौर पर कुछ नहीं बताया। जीशान का कहना है कि इससे वे दोनों ख़तरे में पड़ सकते हैं।

ये एक कहानी है। ऐसे हजारों काले किस्से इस महामारी में घट रहे हैं। बड़ा सवाल ये है कि जब रेमेडेसिविर इंजेक्शन इतनी जरूरी है तो वो पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध क्यों नहीं है? साथ ही इसके साथ एक और सवाल चिपका हुआ है कि अस्पतालों में रेमेडेसिविर नहीं मिल रही है लेकिन “ब्लैक सोर्स” तक ये दुर्लभ दवाई पहुंच जा रही है, आखिर कैसे और क्यों?

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