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दोस्त बनाना एक तरह का एक्टिविज्म है: प्रो. लालबहादुर वर्मा

by Khabartakmedia

खबर तक के लिए निरंजन सहाय…

अपनी दिव्यता और भव्यता के निर्मित टापू पर इतराने वाले बुद्धिजीवियों के बीच प्रो. लालबहादुर वर्मा एक अचरज की तरह थे। अधिकांश बुद्धिजीवियों की तरह उनके लिए जनसरोकार जुमला या जुगाली नहीं था। वे शब्द के सच्चे अर्थों में जनप्रतिबद्ध थें। उनका मानना था शोषण और गैरबराबरी की दुनिया में आततायी ताकतों से मुकाबले का आधार उस सामूहिक चेतना का निर्माण है जिसकी नींव दोस्ती पर टिकी हो। ऐसी दोस्ती जो न्याय, बंधुत्व और समता की मशाल जलाए। बकौल लालबहादुर वर्मा, दोस्त बनाना एक तरह का एक्टिविज्म है, एक तरह का विद्रोह है, एक तरह के विपक्ष का निर्माण है।

वे ऐसे शख्स थे, जिन्होंने बिहार के छपरा से जीवन की शुरुआत की। गोरखपुर, इलाहाबाद होते पेरिस तक ज्ञान के गहरे और विस्तृत वृत्त को ठीक से समझा। प्राचीन इतिहास पर लिखी जिनकी अनेक किताबें भारतीय विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनीं। उन्होंने लालबहादुर शास्त्री आई.ए.एस. एकैडमी, मसूरी में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को सभ्यता-विकास की गुत्थियों को समझने का सलीका अपनी कक्षाओं के माध्यम से सिखाया। उन्होंने हजारों एक्टिविस्ट बुद्धिजीवियों को अपनी उपस्थिति से सम्भव किया। पर सादादिली ऐसी कि कुम्भ मेले में जाकर किताबों की ललक लोगों में जगाने के जुनून को भी सपना बनाया।

किसान आन्दोलनकारियों के बीच चौरासी साल की उम्र में भी जाकर बैठने का हौसला रखा। ऐसे प्रोफ़ेसर थे लालबहादुर वर्मा। उनके इस हौसले के पीछे उनकी जीवनशीलता की वह ललक थी जिसे वे बुद्धिजीवी की भूमिका को व्यापक सामाजिक-संस्कृतिक रूपांतरणकार की भूमिका में देखने के पक्षधर थे।

उनके निधन पर दलित दस्तक की वेबसाइट पर डॉक्टर सिद्धार्थ ने उनकी विरासत के मायने को यूं समझाया, “लालबहुदार वर्मा प्रोफेसर थे, इतिहासकार थे, भंगिमा और इतिहासबोध जैसी जनपक्षधर पत्रिकाओं के संपादक थे, अनुवादक थे। यह उनके लिए बहुत कम मायने रखता था। मेरे लिए भी उनके संदर्भ में यह सब बाते बहुत कम मायने रखती हैं। प्रोफेसर तो आजकल हर शहर में मिल जाते हैं, इतिहासकारों की संख्या भी कम नहीं है, संपादक भी बहुतेरे हैं, अनुवादकों की भी भरमार है। यह सब वर्मा जी के संदर्भ में बहुत कम मायने रखता है। उनके लिए भी बहुत कम मायने रखता था। लालबहादुर वर्मा हमारे समय के एक महान व्यक्तित्व थे, इसकी मूल वजह है, उनका प्रोफेसर होना, इतिहासकार होना,संपादक होना या लेखक होना नहीं है। इसकी मूल वजह है अंतिम सांस तक खूबसूरत दुनिया के सपने को आंखों में सजोए रखना और उस दुनिया के निर्माण के लिए अपना सबकुछ समर्पित कर देना और उसके लिए अंसख्य इंसानों को गढ़ने में लगे रहना। ऐसे व्यक्तित्व या महान कलाकार के निर्माण के लिए कुछ तत्व आवश्यक हैं- गहरे स्तर की संवेदनशीलता, लोकतांत्रिक मानस और वैज्ञानिक टेंपरामेंट। यह सब वर्मा जी में मौजूद था।”

तकरीबन दस दिन पहले प्रो. लाबहादुर वर्मा देहरादून में कोरोना के शिकार हुए। इससे बड़ी विडम्बना भला क्या होगी कि जिस कुलीन तन्त्र की वे लगातार मुखालफत करते रहे, उसी कुलीन तन्त्र ने उनकी तीमारदारी में लगे परिजनों को खूब हलकान किया। कोई आश्वस्तिजनक रास्ता निकलने में लगातार देर होती गयी। नौ मई को एक अदद आईसीयू बीएड के लिए उनकी बेटी आशु और दामाद दिगंबर खूब भटके। इधर प्रो. वर्मा का ऑक्सीजन लेवल लगातार गिरता जा रहा था। किराए पर ऑक्सीजन लिए किसी तरह स्थिति सम्हालने की कोशिशें जारी रहीं। बेहद कठिनाई से 14 मई को आईसीयू बेड एक प्राइवेट अपताल में मिला। पर तबतक काफी देर हो चुकी थी। उनकी किडनी फेल हो गई। समय पर डायलिसिस भी नहीं हो पायी।

रविवार रात 16 मई को उनका देहावसान हो गया। अक्सर अपने लेखों में पूंजीवाद की खिलाफत करने वाले प्रो. वर्मा ने अपने लेख ‘जनतन्त्र और कुलीनता’ में लिखा था, “कुलीनता या श्रेष्ठता-बोध हमारे जन-तन्त्र को कैंसर की तरह ग्रसे हुए है। जिसका हाल-फिलहाल कोई इलाज नहीं दिख रहा है।” कहना न होगा प्रो.वर्मा को कुलीनों के तन्त्र ने जिस तरह गुमनाम मौत का शिकार बनाया उसने इस निर्लज्ज चीख को फिर रचा कि तंत्र को जन से कोई रिश्ता पसंद नहीं।

प्रो. लालबहादुर वर्मा, एक यादगार तस्वीर

10 जनवरी 1938 को बिहार के छपरा में जन्मे प्रो.वर्मा ने 1953 में हाईस्कूल की परीक्षा जयपुरिया स्कूल आनंदनगर, गोरखपुर और इंटरमीडिएट की परीक्षा 1955 में सेंट एंड्रूज कॉलेज एवं बी.ए.1957 में किया। वह छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे। लखनऊ विश्वविद्यालय से 1959 में स्नातकोत्तर के बाद 1964 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्रो. हरिशंकर श्रीवास्तव के निर्देशन में ‘एंग्लो इंडियन कम्युनिटी इन नाइनटिन सेंचुरी इंडिया’ पर शोध किया। उन्होंने हिन्दी में बेहद खूबसूरत और विचारवान पत्रिका की शुरुआत की, ‘इतिहासबोध’। डा. लाल बहादुर वर्मा की हिंदी, अंग्रेजी और फ्रांसीसी में ‘अधूरी क्रांतियों का इतिहासबोध’, ‘इतिहास क्या, क्यों कैसे?’, ‘विश्व इतिहास’, ‘यूरोप का इतिहास’, ‘भारत की जनकथा’, ‘मानव मुक्ति कथा’, ‘ज़िन्दगी ने एक दिन कहा था’ और ‘कांग्रेस के सौ साल’ आदि करीब अठारह पुस्तकें प्रकाशित हैं।

उन्होंने लोकप्रिय इतिहासकार एरिक होप्स बाम समेत कई लेखकों की अंग्रेजी और फ्रेंच पुस्तकों का अनुवाद भी किया। उन्होंने अमेरिकी साहित्यकार हार्वड फास्ट के अंग्रेजी उपन्यास ‘द अमेरिकंस‘ का भी हिंदी अनुवाद किया। इस अनूदित कृति का प्रकाशन हरियाणा हिंदी अकादमी ने नई सहस्त्राब्दि के प्रारम्भ में किया। गौरतलब है कि हिंदी के महान लेखक प्रेमचंद के सुपुत्र अमृत राय ने हार्वड फास्ट की कई कृतियों का हिंदी अनुवाद किया है। पर वे भी ‘द अमेरिकंस’ का अनुवाद नहीं कर सके। क्योंकि इस पर अमेरिका की सरकार के प्रतिबंध के कारण उसकी दुनिया भर में खरीद बिक्री बिल्कुल बंद थी। इंटरनेट के प्रचलन के बाद नई सहस्त्राब्दि में द अमेरिकंस सीमित रूप से ही उपलब्ध हो सका।

1968 में फ्रेंच सरकार की छात्रवृत्ति पर पेरिस में आलियांस फ्रान्सेज योजना के तहत फ्रेंच भाषा और संस्कृति की विशेष शिक्षा हासिल की। इस शैक्षणिक यात्रा ने उनके नजरिए का और भी परिष्कार किया। फर्स्टपोस्ट में 14 अगस्त 2017 को उन्होंने एक लेख ‘असली आजादी तो तब मिलेगी जब किसी पर कोई दबाव न हो’ उस दौर को याद करते हुए लिखा, “फ्रांस से लौटने पर जब मैं एक एक्टिविस्ट टीचर बना, और लगा कि टीचर को एक्टिविस्ट भी होना चाहिए, अच्छा टीचर वही है। तो मैंने ‘भंगिमा’ नामक एक पत्रिका निकाली और उसे अपने देश की एक प्रतिष्ठित पत्रिका ‘सेमिनार’ की तरह शुरू करने का इरादा किया। ‘भंगिमा’ का पहला अंक जो निकला उसकी थीम ही मैंने ‘आज़ादी: क्या, क्यों, कैसे?’ रखी। उसमें मैंने लोगों के मत छापे। मैंने देखा कि आज़ादी की अवधारणा ही लोगों की भिन्न भिन्न है, इतनी अस्पष्ट है कि आखिर इस देश में आज़ादी चरितार्थ कैसे हो?”

’प्रो.वर्मा ताउम्र अपने मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध रहे। उन्होंने विचारों और कर्मों की सान पर अपनी समझ और अनुभव को जनचेतना में रूपांतरित करने का काम किया। प्रो. वर्मा की भौतिक और बौद्धिक दुनिया में शामिल नागरिकों को यह अहसास बखूबी था कि वे ऐसे इंसान गढ़ने वाले एक महान कलाकार और जनशिक्षक थे, जिन्होंने एक नहीं, दो या सैकड़ों नहीं, हजारों इंसानों में इल्म की रोशनी को इस तरह गढ़ा कि निगाहों में खूबसूरत दुनिया के ख्वाबों ने आकार लिया। वे अपने-अपने तरीके से बेहतर दुनिया बनाने की कोशिश में लग गए। प्रो.वर्मा ने फ्रांस में रहते हुए मई 1968 के विद्यार्थीं आन्दोलन की तपिश को बहुत करीब से महसूस किया था। उन्होंने देखा कि कैसे विद्यार्थियों की ताकत बदसूरत दुनिया को खुबसूरत दुनिया में रूपांतरित कराती है। अपने अध्यापकीय जीवन के दरमियान और बाद में भी उन्होंने अनेक पेशेवर क्रांतिकारी गढ़े, जमीन एक्टिविस्ट गढ़े, नाटककार गढ़े, गीतकार गढ़े और कवि-लेखक गढ़े।

उन्होंने शिक्षा संस्थानों की पारंपरिक चारदीवारी को विचारों और प्रतिबद्धता की तेजोमय मुद्रा से ढहा दिया। उन्होंने तथाकथित प्रोफेसरों की आभिजात्य दुनिया के काल्पनिक मंसूबों और निरपेक्ष तटस्थता से अलग अपनी दुनिया का निर्माण किया। किसान, मज़दूर, सफाईकर्मी, झुग्गीझोपड़ीं के बाशिंदों, यौनकर्मी, थर्ड जेंडर सभी उनकी चिंताओं में शामिल हुए। उनके बीच वे गए, उन्हें समझा फिर उनपर कुछ कहा और मुक्ति के लिए बौद्धिक अभियानों की कार्ययोजनाएं बनायीं।

इसे समझने के लिए “कथन” पत्रिका के के जुलाई-दिसंबर 2019 के अंक में संज्ञा उपाध्याय को दिए गए साक्षात्कार के अंश को देखना मुनासिब होगा। उन्होंने इस साक्षत्कार में कहा, “मैं अकादमिक और साहित्यिक होते हुए भी एक्टिविस्ट रहा हूं। जब गोरखपुर में था, तब भी; जब इलाहाबाद में था, तब भी और अब जबकि देहरादून में रहता हूं तब भी। हालांकि अब मैं बूढ़ा और रिटायर हो गया हूं- मैं एक काम हमेशा करता रहा हूं : दोस्ती करना। आज की दुनिया में जबकि दुश्मनियां बढ़ाई जा रही हैं, दोस्त बनाना एक तरह का एक्टिविज्म है, एक तरह का विद्रोह है, एक तरह के विपक्ष का निर्माण है। दोस्ती का मतलब कोई पार्टी या संगठन बनाना नहीं है। दोस्ती का मतलब है एक-दूसरे को भला इंसान मानना, एक-दूसरे पर विश्वास और भरोसा करना, एक-दूसरे के दुख-सुख में शामिल होना और धर्म, जाति, पेशे, स्टेटस, विचारधारा, राजनीति, खान-पान, रहन-सहन आदि के तमाम भेद होते हुए भी दोस्ती करना और उसे निभाना। मैं फेसबुक वाली दोस्ती की नहीं, आभासी दुनिया वाली दोस्ती की नहीं, वास्तविक दोस्ती की बात कर रहा हूं। मैं दोस्तों से बाहर ही नहीं मिलता, उनके घर जाकर भी मिलता हूं, उन्हें अपने घर बुलाकर भी मिलता हूं, मतभेद होते हुए भी मैं उनसे बातें और बहसें करता हूं। इस तरह मैं और मेरे दोस्त कोई लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन मुझे उम्मीद है कि अगर कभी सच और झूठ, न्याय और अन्याय, मानुषिकता और अमानुषिकता के सवाल पर कोई लड़ाई हुई, तो मैं और मेरे दोस्त तमाम मतभेदों के बावजूद सत्य, न्याय और मनुष्यता के पक्ष में खड़े होकर लड़ेंगे। लड़ेंगे और जीतेंगे भी।”

प्रो. लालबहादुर वर्मा दुनिया की बेहतरी के लिए जिस जनतंत्र की वकालत कर रहे थे, उसकी बुनियादी इकाई घर मानते थे। कहते हैं घर हर इंसान की पहली पाठशाला होती है। दुर्भाग्य यह है कि ज्यदातर घरों की बुनियाद तानाशाही पर टिकी होती है। वे एक खूबसूरत दुनिया का आगाज खूबसूरत घर से करने के हिमायती थे। वे घर में मुक्ति की मुकम्मल अवधारणा भी पेश कर रहे थे। बकौल प्रो. लाल बहादुर वर्मा, “जब तक दुनिया में ‘घर’ जनवादी नहीं होंगे तब तक दुनिया में जनवाद पनप नहीं सकता। मेरी समझ से घर समाज का ‘परमाणु’ है, ‘इकाई’ है. ऐसे में घर में ही ‘वैयक्तिकता’ और ‘सामाजिकता’ पनपती है। यानि व्यक्ति का ‘व्यक्तित्व’ भी बचा रहे और उसकी ‘सामाजिकता’ और ‘परस्परता’ भी बनी रहे। इसलिए अगर यह ‘घर’ जो वह होना चाहिए वह नहीं हो पा रहा तो दुनिया भी वह नहीं हो पाएगी जो उसे होना चाहिए।

तो ऐसे में ‘घर’ में ‘मुक्ति’ का मतलब क्या होगा? पहले तो घर को ‘लोकतांत्रिक’ होना चाहिए। स्त्री, पुरुष, वयस्क, अवयस्क सबके अधिकार और कर्तव्य होने चाहिए। आज भी बहुत से परिवारों में कमाने वाले का ही वर्चस्व कायम है। आज भी बच्चों और महिलाओं को एक हद तक आज़ादी मिली है लेकिन जहां आज़ादी मिली भी है वहां मानसिकता नहीं बदली। यानि घर में ‘मुक्ति’ तभी आएगी जब किसी एक का ‘वर्चस्व’ न हो। हम किसी पर कुछ आरोपित न करें, यहां तक की बच्चे पर भी, उसका भी अपना व्यक्तित्व है। कोई किसी पर अपने को लादे न। हर व्यक्ति की संभावना को विकसित होने का मौका मिले। ‘आरोपित अनुशासन’ से घरों को मुक्त होना होगा, क्योंकि इससे न घर फलीभूत होते हैं न देश। यह एक लम्बी लड़ाई है।

प्रो. लालबहादुर वर्मा चले गए पर उनके विचार और उनके सपने मशाल की तरह बदलाव में यकीन रखने वालों की उदासी और अंधेरे को दूर करेंगे। जीत के सपने पर प्रो. वर्मा को यकीन था। उनके चाहने वालों का यकीन कायम रहे, यह उम्मीद की जा सकती है।

बकौल फैज अहमद फैज-
“यूं ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से खल्क’
न उनकी रस्म नयी है, न अपनी रीत नयी.
यूं ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल,
न उनकी हार नयी है न अपनी जीत नयी।”

(प्रो.निरंजन सहाय महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में हिन्दी के प्रोफ़ेसर और नोडल ऑफिसर यूजीसी के रूप में कार्यरत हैं। हिन्दी की अधिकाँश प्रतिष्ठित पत्र/पत्रिकाओं में प्रो. सहाय के नियमित लेखन प्रकाशित होते रहते हैं।)

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1 comment

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बजरंग बिहारी May 20, 2021 - 2:00 am

प्रो. लालबहादुर वर्मा पर यह बेहतरीन श्रद्धांजलि लेख है। इससे एक जनबुद्धिजीवी के बनने की प्रक्रिया को समझा जा सकता है।
समाज को दिशा देने में प्रो. वर्मा लगे रहे। उनके योगदान को प्रो. निरंजन सहाय का यह लेख बखूबी रेखांकित करता हेै।

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