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2020 की दो बड़ी खबरें जिसपर मीडिया ने TRP संग खूब फजीहत बटोरी

by Khabartakmedia

साल 2020 कई मायनों में बेहद निराशजनक वर्ष रहा। इस साल ऐसे कम ही मौके आए जब लोगों के चेहरे पर मुस्कान देखी गई और जिसे लोगों ने खूब सराहा। आफतभरा यह पूरा साल एक और बात के लिए भारत की कड़वी यादों का हिस्सा बन गया है। 2020 में भारत की जनता ने कई मामलों में भारी गिरावट दर्ज की। मसलन अर्थव्यवस्था तो इतनी गिरी की मानो लेट ही गई। लेकिन जो गर्त की असीम और न मापी जाने लायक गहराई तक गिरा वो है भारत की “राष्ट्रीय मीडिया”। इस साल ऐसे कई काले अवसर आए जब मीडिया ने खूब छीछालेदर मचाया। हालांकि इस गलीजपने का फायदा मीडिया को टीआरपी के रूप में मिली। ये अलग बात है कि बाद में कभी न्यायालय ने तो कभी किसी संस्था मीडिया के कारनामे के लिए खूब लताड़ लगाई और टीवी के न्यूज चैनल्स को कई बार सार्वजनिक तौर पर माफी भी मांगनी पड़ी। इस साल ऐसे कई खबरों में से जिन दो खबरों का जिक्र होने वाला वो हैं “तबलीगी जमात प्रकरण” और “सुशांत सिंह राजपूत मामला”।

तबलीगी जमात प्रकरण:

भारत में 30 जनवरी, 2020 को कोरोना वायरस संक्रमण का पहला मामला केरल राज्य में दर्ज किया गया था। 3 फरवरी को दो नए मामलों की पुष्टि हुई। ये सभी छात्र थे जो चीन के वुहान शहर से लौट कर आए थे। वुहान वो ही शहर है जहां से कोरोना वायरस की उत्पति हुई थी। इसके बाद धीरे-धीरे भारत में संक्रमण के मामले बढ़ने लगे। मरीज सौ और फिर हजार की तरफ बढ़ने लगे थे। तभी अचानक दिल्ली स्थित निजामुद्दीन मरकज सुर्खियों में आ गया। हर अख़बार और टीवी न्यूज चैनल पर तबलीगी जमात दिखाई देना लगा। दरअसल मध्य मार्च में मुसलमानों के एक संगठन तबलिगी जमात जो दुनिया के कई देशों में सक्रिय रूप से इस्लाम धर्म का प्रचार प्रसार करता है, दिल्ली के अपने मुख्यालय पर एक कार्यक्रम करने वाला था। निजामुद्दीन मरकज दक्षिणी दिल्ली में मौजूद है। इस मरकज में हजारों की संख्या में दुनिया के कई देशों से मुसलमान आए हुए थे। कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों को देखते हुए दिल्ली सरकार ने किसी भी तरह के कार्यक्रम जिनमें दो सौ से अधिक लोगों का जमावड़ा हो करने से सख्त मना किया था और इससे संबंधित जारी निर्देश जारी किए गए थे। हालांकि इस आदेश के आने से पहले ही निजामुद्दीन मरकज में तबलीगी जमात के लोग पहुंच चुके थे। पुलिस को जब इस जगह का पता चला और सभी लोगों की कोविड जांच हुई तो कई लोग इस संक्रमण के शिकार पाए गए। इसके बाद से दिन रात तबलीगी टीवी स्क्रीन पर छाए रहे। मीडिया ने दिन रात इस मामले को बढ़ा चढ़ाकर परोसा। यहां तक कि दिल्ली और केंद्र की सरकारों ने भी कोरोना बुलेटिन जारी करते वक्त तबलीगी के लोगों का आंकड़ा अलग से बताया। अगले 2-3 महीनों तक न्यूज चैनल्स से लेकर सोशल मीडिया तक तबलीगी जमात को आधार बनाकर भारतीय मुसलमानों के खिलाफ प्रोपेगैंडा चलाया। मीडिया ने तबलीगी जमात को कोरोना वायरस स्प्रेडर (कोरोना फैलाने वाले) के रूप में पेश किया। भारत में कोरोना संक्रमण का इकलौता कारण तबलीगी जमात को घोषित करने की कवायद मीडिया ने की। कुछ चैनल्स ने इसे एक जिहाद बताया जो मुसलमान जानबूझकर कर रहे थे। तबलीगी जमात के लोगों पर दिल्ली पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया और उसके प्रमुख मौलाना साद की खोज करने लगी। हालांकि जब ये मामला न्यायालय पहुंचा तो अलग-अलग उच्च न्यायालयों ने तबलीगी जमात के लोगों को निर्दोष करार देते हुए मीडिया को खूब लताड़ लगाई जिन्होंने उस दौरान प्रोपेगैंडा मशीन की तरह काम किया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने तो तबलीगी जमात के विदेशी यात्रियों को अतिथि कहते हुए कहा कि भारत में अतिथि भगवान का रूप होता है और मीडिया ने इन लोगों को बली का बकरा बनाया है।
जिन मीडिया चैनल्स ने शुरुआती दौर में तबलीगी जमात को जानबूझकर बदनाम किया और समाज मुसलमानों के खिलाफ जहर घोलने का काम किया उन्होंने बाद में हाई कोर्ट के फैसलों को कभी न्यूज के तौर पर नहीं दिखाया।

सुशांत सिंह राजपूत मामला:

हिन्दी फिल्म जगत के उभरते सितारे सुशांत सिंह राजपूत की मौत इसी साल 14 जून को हो गई थी। 14 जून को सुशांत सिंह राजपूत का शरीर मुंबई के उनके बांद्रा फ्लैट से संदिग्ध अवस्था में पंखे से झूलता हुआ मिला। सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने सिनेमा जगत के इतर पूरे देश को एक सदमे में धकेल दिया। बिहार का एक लड़का जो कभी इंजीनियरिंग की पढ़ाई करता था लेकिन फिर फिल्मी दुनिया में आ गया और छोटे पर्दे पर धारावाहिक करने के बाद बड़े पर्दे पर भी अपने अभिनय का लोहा मनवाया। मीडिया अभी तबलीगी जमात को लेकर अपनी भ्रामक अभियान चला ही रही थी कि उन्हें एक ऐसी खबर मिल गई जिसके जरिए वेे अगले कई महीनों तक टीआरपी बटोर सकते थे और लोगों का ध्यान कोरोना के खिलाफ लड़ाई में सरकार की तैयारियों से हटा सकते थे। तालाबंदी के कारण पैदा हुई असंख्य दिक्कतों और सरकार पर उठते सैकड़ों सवालों से ध्यान हटाने के लिए मीडिया को मसाले की जरूरत जो उसे सुशांत सिंह राजपूत की झकझोरने वाली आत्महत्या के रूप में मिली।

रिया चक्रवर्ती के जेल से रिहा होने पर मीडिया के पीछा करने पर कार्टूनिस्ट सतीश आचार्या की कार्टून

14 जून के बाद मीडिया चैनल्स ने दिन रात सुशांत की कहानी को चलाना शुरू कर दिया। उनकी मौत के पीछे साजिशों का खुलासा करने वाली बेहूदी कहानियां गढ़ी गईं। एक के बाद एक बॉलीवुड के कई दूसरे सितारों को न्यूज चैनलों ने अपना शिकार बनाया। और इस गिद्धपन में जो सबसे बुरी तरह फंसी वो कोई और नहीं बल्कि सुशांत सिंह राजपूत की गर्लफ्रेंड और अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती थीं। रिया चक्रवर्ती को सुशांत सिंह राजपूत के हत्यारे के रूप में प्रोजेक्ट किया गया और एक अभियान चलाया गया। मीडिया के बड़े चैनल्स ने उन्हें “विष कन्या” और “जादू टोना” जानने वाली लड़की के रूप में दिखाया। एनसीबी द्वारा किए जा रहे जांच में जब भी रिया चक्रवर्ती एनसीबी कार्यालय जाती थीं मीडिया का जमावड़ा उनके साथ चलता था बल्कि रास्ते में उनकी गाड़ी का भी पीछा किया जाता था। सुशांत सिंह राजपूत के मामले में मीडिया ने अब तक के सभी हदों को पार कर दिया। नैतिकता तो मीडिया में पहले ही खत्म हो चुकी थी लेकिन इस बार न्यूज चैनल्स ने खुद के सबसे नंगे रूप को लोगों के सामने रखा। हालांकि जब 3-4 महीने के बाद मीडिया पर नजर रखने वाले कुछ संस्थाओं ने एक-एक करके कई न्यूज चैनलों को लताड़ लगाई। साथ ही कई झूठी, मनगढ़ंत खबर चलाने के लिए और जानबूझकर कुछ दूसरे फिल्मी सितारों को इस कीचड़ में घसीटने के लिए मीडिया के कई बड़े चैनलों को सार्वजनिक तौर पर अपने प्राइम टाइम में लिखित और ऑॅडियो- वीडियो रूप में माफी मांगनी पड़ी।

सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या को हत्या घोषित करने वाले न्यूज चैनल पर व्यंग जब एम्स की रिपोर्ट में सुशांत के खुदकुशी करने की पुष्टि हुई (कार्टून: सतीश आचार्या)

तो ये थी साल 2020 की वो दो खबरें जिन्हें मीडिया ने खूब रौंदा और अपनी भद्द पिटवाई। इस नंगी दौड़ में महज कुछ खबरिया चैनलों के अलावा सभी ने जोर शोर से हिस्सा लिया और दर्शकों को मूर्ख बनाया। ये कोशिशें कई वजहों से की गई। लोगों का विश्वास मीडिया में से उठ चुका है। भरोसा खो चुकी मीडिया के लिए अब जनता नहीं बल्कि टीआरपी और सत्ता की मित्रता ही ख़ास हो चुकी है। नए साल में देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रीय टीवी न्यूज चैनल अपने में क्या बदलाव लाएंगे? हालांकि इसकी उम्मीद ना के बराबर है।

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