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जन्मजयंती विशेष: इंदिरा गांधी के दौर में लोकनायक कहलाए जयप्रकाश नारायण, इस दौर में देश विरोधी कहलाते?

by Khabartakmedia

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राजनीतिक संगठन जनसंघ ने 1984 में अपनी काया छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी का रूप ले लिया। उसके बाद से भाजपा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है। भाजपा पिछले लोकसभा चुनाव में कुल 303 सीटें जीत कर केंद्र में पहुंची और देश पर राज कर रही है। उनके फासीवादी तौर-तरीकों से आक्रांत और निराश लोग अब कहने लगे हैं कि यदि जय प्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी की निरंकुशता के खिलाफ 1974 में छिड़े आंदोलन में जनसंघ को साथ नहीं लिया होता और आरएसएस को ‘मसल पावर आफ द मूवमेंट’ नहीं बताया होता, तो आज भाजपा इस कदर ताकतवर नहीं हुई होती।
जयप्रकाश नारायण एक ऐसे ही शख्स थे जिन्होंने अपनी जिंदगी देश के नाम कर दी और अकेले दम पर तत्कालीन इंदिरा सरकार को दिन में तारे दिखला दिए। जयप्रकाश नारायण का नाम जब भी जुबां पर आता है तो यादों में रामलीला मैदान की वह तस्वीर उभरती है जब पुलिस जयप्रकाश को पकड़ कर ले जाती है और वह हाथ ऊपर उठाकर लोगों को क्रांति आगे बढ़ाए रखने की अपील करते हैं। जयप्रकाश नारायण ही वह शख्स थे जिनको गुरू मानकर आज के अधिकतर नेताओं ने मुख्यमंत्री पद तक की यात्रा की है। लालू यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, राम विलास पासवान, जार्ज फर्नांडिस, सुशील कुमार मोदी जैसे तमाम नेता कभी जयप्रकाश नारायण के चेले माने जाते थे लेकिन सत्ता के लोभ ने उन्हें जयप्रकाश नारायण की विचारधारा से बिलकुल अलग कर दिया। यह जयप्रकाश नारायण ही थे जिन्होंने उस समय की सबसे ताकतवर नेता इंदिरा गांधी से लोहा लेने की ठानी और उनके शासन को हिला भी दिया। लेकिन यह दुर्भाग्य की बात है कि आज उनके आदर्शों की उनकी ही पार्टी में कोई पूछ नहीं है। सभी जानते हैं अगर इतिहास में जयप्रकाश नारायण नाम का इंसान नहीं होता तो भारतीय जनता पार्टी का कोई भविष्य ही नहीं होता। अपने जीवन में संतों जैसा प्रभामंडल केवल दो नेताओं ने प्राप्त किया। एक महात्मा गांधी थे तो दूसरे जयप्रकाश नारायण। इसलिए जब सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बाद वे 1974 में ‘सिंहासन खाली करो जनता आती है’ के नारे के साथ वे मैदान में उतरे तो सारा देश उनके पीछे चल पड़ा, जैसे किसी संत महात्मा के पीछे चल रहा हो। देश की आजादी का जिक्र होने पर जिस तरह सबसे पहले और सबसे प्रमुखता से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जिक्र होता है, उसी तरह देश की दूसरी आजादी का सबसे बड़ा श्रेय लोकनायक जयप्रकाश नारायण को जाता है। दूसरी आजादी यानी देश में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से थोपे गए आपातकाल का खात्मा और लोकतंत्र की बहाली।

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को नया जीवन देने वाले जयप्रकाश यानी जेपी का जन्म आज ही के दिन 1902 में हुआ था। जयप्रकाश नारायण का जन्म बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमा पर मौजूद छोटे से गांव सिताबदियारा में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा गांव में हासिल करने के बाद सातवीं क्लास में उनका दाखिला पटना में कराया गया है। बचपन से ही मेधावी जयप्रकाश को मैट्रिक की परीक्षा के बाद पटना कॉलेज के लिए स्कॉलरशिप मिली। बताया जाता है कि वह पढ़ाई के दौरान ही गांधीवादी विचारों से प्रभावित थे और स्वदेशी सामानों का इस्तेमाल करते थे। वह हाथ से सिला कुर्ता और धोती पहनते थे। 18 साल की उम्र में 1920 में जेपी का विवाह ब्रज किशोर प्रसाद की बेटी प्रभावती से हुआ। कुछ साल बाद ही प्रभावती ने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया और अहमदाबाद में गांधी आश्रम में राष्टपिता की पत्नी कस्तूरबा के साथ रहने लगीं। जेपी ने भी पत्नी के साथ ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया। जेपी ने पढ़ाई के दौरान ही अंग्रेजों के खिलाफ जंग भी छेड़ दी थी। अंग्रेज सरकार की ओर से वित्तपोषित होने की वजह से जेपी ने कॉलेज को बीच में ही छोड़ दिया और बिहार कांग्रेस की ओर से चलाए गए बिहार विद्यापीठ को जॉइन किया था। 1922 में वे कैलिफोर्निया गए और जनवरी 2023 में ब्रार्कले में दाखिला लिया। समाजशास्त्र की पढ़ाई करते हुए उन्होंने अपना खर्च वहन करने के लिए गैराज में काम किया। पढ़ाई के दौरान ही वह रूसी क्रांति और मार्क्सवाद से प्रभावित हुए। 1929 में वह एक मार्क्सवादी के रूप में अमेरिका से भारत वापस लौटे और उसी साल कांग्रेस में शामिल हो गए। आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभा रहे जेपी को 1932 में गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में उन्हें काफी यातनाएं दी गईं। जेल से बाहर आने के बाद वह भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए। इसी दौरान कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ और जेपी इसके महासचिव बनाए गए। 1954 में उन्होंने बिहार में बिनोवा भावे के सर्वोदल आंदोलन के लिए काम करने की घोषणा की थी। 1957 में उन्होंने राजनीति छोड़ने का भी फैसला कर लिया था। हालांकि, 1960 के दशक के अंत में एक बार फिर वे राजनीति में सक्रिय हो गए थे। उन्होंने किसानों के आंदोलनों की भी अगुआई की। इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा चुनाव में अयोग्य ठहराए जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी थी। विपक्ष के सभी बड़े नेताओं को जेल में ठूस दिया गया और अभिव्यक्ति की आजादी पर भी पहरा लगा दिया गया। जयप्रकाश नारायण ने उस समय देश को एकजुट किया और उनके जनआंदोलन का ही परिणाम था कि करीब 21 महीने बाद 21 मार्च 1977 को आपताकाल खत्म हो गया। जयप्रकाश नारायण प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ थे। 1974 में पटना में छात्रों ने आंदोलन छेड़ा था। आंदोलन को शांतिपूर्ण तरीके से अंजाम देने की शर्त पर उन्होंने इसकी अगुआई की। इसी दौरान देश में सरकार विरोधी माहौल बना तो इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी थी। जेपी भी जेल गए और करीब सात महीनों तक सलाखों के पीछे रहे। उनकी तबीयत भी उन दिनों खराब थी, लेकिन जो सम्पूर्ण क्रांति का नारा दिया, उसने देश में लोकतंत्र की बहाली दोबारा सुनिश्चित कर दी। जेपी आंदोलन में छात्र नेता में शामिल हुए कई नेता जैसे लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार, राम विलास पासवान, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद सुशील मोदी जैसे दर्जनों नेता बाद में वर्षों तक सत्ता में रहे। आपातकाल की लड़ाई में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हिस्सा लिया था। आपातकाल के बाद देश में चुनाव हुए तो कांग्रेस पार्टी की करारी हार हुई और केंद्र में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। खुद इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी चुनाव हार गए थे।
यह बात अब सिर्फ कांग्रेसी, समाजवादी या कम्युनिस्ट खेमा नहीं कह रहा बल्कि 74 आंदोलन का नेतृत्व कर रही छात्र युवा संघर्ष वाहिनी धारा के कई लोगों ने भी हाल में यह बात मुखर शब्दों में कही है कि जनसंघ या आरएसएस को आंदोलन में शामिल कर जेपी ने ऐतिहासिक भूल की थी।
संघ समर्थक इस बात को बार-बार दोहराते हैं कि जनसंघ के एक कार्यक्रम में जेपी ने कहा था कि यदि जनसंघ फासिस्ट है तो मैं भी फासिस्ट हूं। जेपी के निकटतम सहयोगियों ने जेपी को उस अधिवेशन में न जाने की सलाह दी थी लेकिन जेपी न सिर्फ वहां गए बल्कि उन्होंने एक ऐसा वक्तव्य दे डाला, जिसे संदर्भ से काट कर खूब उछाला गया। भाजपा व आरएसएस के लोग इस बयान को एक सर्टीफिकेट की तरह इस्तेमाल करते हैं। जेपी की पहल पर जनसंघ ने अपना विलय जनता पार्टी में कर लिया था। आंदोलन के प्रभाव और आपातकाल के दबाव की वजह से जनसंघ के नेताओं ने रणनीति बदल ली थी। यही वजह थी कि 1977 के निर्वाचन में जनसंघ ने कट्टर हिंदुत्व का प्रचार नहीं किया और न ही अपने झंडे का उपयोग किया। जनसंघ के प्रत्याशियों ने जनता पार्टी की सदस्यता पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसमें लिखा था – ‘मैं महात्मा गांधी द्वारा देश के समक्ष प्रस्तुत मूल्यों और आदर्शों में आस्था जताता हूं और समाजवादी राज्य की स्थापना के लिए खुद को प्रस्तुत करता हूं।’
संघ के इरादे कुछ और थे!
यह भी उल्लेखनीय है कि जेपी आंदोलन के दौरान संसद पर होने वाले प्रदर्शन के पहले जेपी ने जनसंघ के सम्मेलन में स्पष्ट कहा था कि जनसंघ के लोग केसरिया टोपी नहीं लगायेंगे और अपना झंडा साथ ले कर मार्च में शामिल नहीं होंगे। लालकृष्ण आडवाणी ने यह बात मान भी ली थी। लेकिन बाद की राजनीतिक घटनाओं ने इस आशंका को सही साबित किया कि जनसंघ या आरएसएस ने सिर्फ अपने दूरगामी लक्ष्य के लिए इस तरह के ढकोसले किए। उसने अपना लक्ष्य कभी नहीं बदला और उस लक्ष्य तक पहुंचने के तरीकों को वे कभी नहीं भूले। संघ को मंच और महत्व देने के लिए जेपी की आलोचना उनके जीवन काल में भी हुई, जिसकी वजह से आपातकाल में जेल में रहते हुए उन्होंने बिहार की जनता के नाम एक पत्र में कहा- ‘संपूर्ण क्रांति आंदोलन में उन्हें शामिल कर मैंने उनको (जनसंघ और आरएसएस को) डिकम्युनलाइज करने, यानि, असांप्रदायिक बनाने की कोशिश की है। ’यह बात सही है कि जेपी के विरोधी जेपी के उस ऐतिहासिक वक्तव्य को संदर्भ से काट कर रखते हैं। हमें उस वक्त की ऐतिहासिक परिस्थितियों पर भी गौर करना चाहिए। बिहार आंदोलन स्कूल के छात्रावासों में व्याप्त कदाचार को लेकर शुरू हुआ और बाद में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में बदल गया। विधानसभा पर एक प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग हुई और दर्जनों लोग मारे गये। खौफ को तोड़ने के लिए जेपी ने उस आंदोलन का नेतृत्व इस शर्त पर स्वीकार किया कि आंदोलन की बागडोर पूरी तरह उनके हाथों में रहेगी और आंदोलन शांतिपूर्ण होगा। आंदोलन व्यापक हुआ और पुलिस द्वारा बर्बर लाठी चार्ज के बाद विधानसभा को भंग करने की मांग शुरू हो गई। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का कहना था कि एक चुनी हुई सरकार को भंग करने की मांग करने वाला यह आंदोलन फासिस्ट है. आंदोलन में शामिल हो चुके जनसंघ और आरएसएस को खास तौर से फासिस्ट संगठन कह कर आंदोलन पर आक्रमण किया गया.जेपी का कहना था, ‘बिहार आंदोलन का नेतृत्व वे कर रहे हैं और अन्य राजनीतिक दल अपना झंडा बैनर छोड़ कर इसमें शामिल हुए हैं। एक फासिस्ट सरकार का विरोध कर रहे आंदोलन में जो भी उनकी शर्तों पर शामिल होता है, उन्हें उसका समर्थन स्वीकार्य है। यदि एक फासिस्ट सरकार का विरोध करने वाला जनसंघ फासिस्ट है तो मैं भी फासिस्ट हूं। ’जयप्रकाश नारायण की हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ता था। बिहार से उठी सम्पूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी। जेपी के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण घर-घर में क्रांति का पर्याय बन चुके थे। लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान या फिर सुशील मोदी, आज के सारे नेता उसी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का हिस्सा थे।
दिल्ली के रामलीला मैदान में एक लाख से अधिक लोगों ने जब जय प्रकाश नारायण की गिरफ्तारी के खिलाफ हुंकार भरी थी तब आकाश में सिर्फ उनकी ही आवाज सुनाई देती थी। उस समय राष्ट्रकवि रामधारी सिंह “दिनकर” ने कहा था “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” जयप्रकाश मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित हुए और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण योगदान के लिये 1998 में लोकनायक जय प्रकाश नारायण को मरणोपरान्त भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। जेपी ने आठ अक्टूबर, 1979 को पटना में अंतिम सांस ली।

(लेखक: पुरुषोत्तम कुमार)

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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