Latest News
Home चुनावी हलचल गुजरात मॉडल बनाम कर्पूरी मॉडल

गुजरात मॉडल बनाम कर्पूरी मॉडल

by Khabartakmedia

बिहार चुनाव का शोर शराबा जोरों पर है ,पहले चरण का चुनाव सम्पन्न भी हो चुका है मगर इन हालातों में पार्टी और नेताओं की पिछले चुनावों की तरह जुमलेबाजी जारी है। बाढ़ और कोरोना काल मे गायब रहे हमारे जनप्रतिनिधि चुनाव के इस दौर में जनता के बीच नजर बेहतरी से आ रहे है मानो गाँव के चौकीदार हैं।तमाम नेताओ की जन हितकारी नीतियों में एक बात सुनने में आई कि बिहार में कर्पूरी मॉडल पर हमारी सरकार बनने पर अमल किया जाएगा।राजद, जदयू, और गुजरात मॉडल वाली भाजपा के नेता भी यही कहते नजर आ रहे हैं। 2014 में केंद्र में सरकार बना चुके गुजरात मॉडल को इस देश की जनता नंगी और लेंस वाले आँखों से तलाशने में असफल रही है।जनता इस बात से आश्वस्त हो चुकी है शायद कि गुजरात मॉडल पानी मे उकेरी जाने वाली चित्र की भाँति है जिसे भाजपा ने उकेरा। मगर 6 सालों के बाद भी जनता को नजर नहीं आया, आखिर ये कैसा है? क्या है? समय बीत चुका है तबसे कई चुनाव हुए मगर मॉडल की बात भुला दी गई है। वक्त के साथ बदलाव की जरूरत भी है। बिहार चुनाव में बाढ़, बेरोजगार और खस्ताहाल प्रशासन और शिक्षा व्यवस्था से हताश, परेशान और निराश युवा के सामने “बिहार में का बा” और “बिहार में ई बा” के बीच कर्पूरी मॉडल याद कराया जा रहा है जो कि 77 के दौर में चर्चा में आया था। कर्पूरी मॉडल की बात करें तो 1977 में मुख्यमंत्री रहने के दौरान जननायक ने 26% आरक्षण को लागू किया था जिसमें 20% पिछड़ी जातियों को और 3% आर्थिक रूप से कमजोर अगड़ी जातियों को और 3% सभी वर्ग की महिलाओं के लिए था जो कि मंडल आयोग के गठन से पहले ही बिहार में लागू हो गया था। बाद में 20 दिसम्बर 1978 में मंडल आयोग का गठन हुआ। जिसमें पिछड़े वर्ग को 27% आरक्षण देने की बात की गई। इसके अलावा बिहार में 8 वीं तक के सभी लोगों को निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की गई थी। बाद में जो भारत सरकार के द्वारा समूचे देश मे लागू की गई। कर्पूरी नीति के हिसाब से तमाम नीति पहले ही बिहार में लागू किए जा चुके थे जो आज अहम बनी हुई हैं, भ्रष्टाचार मुक्त शासन के साथ कर्पूरी शासन जन हितकारी भी था।मगर अगड़ी जाति के नेताओं और समाज के लिए हमेशा विलयन समझे गए यद्यपि उनकी नीति और सिद्धान्त उनके खिलाफ नहीं था बल्कि पिछड़े वर्ग और महिलाओं के विकास और उत्थान के लिए था। अपनी जिन नीतियों के कारण उस समय अपनी सत्ता खो चुकी कर्पूरी सरकार, आज वही बिहार के लिए वरदान साबित हो रही है। गुजरात मॉडल जिसके सहारे भाजपा केंद्रीय सत्ता पर आसीन हुई, आज वो बिहार चुनाव से गायब है। जनता का विश्वास और विकास कर्पूरी मॉडल है, गुजरात मॉडल नहीं ये बिहार के नेता और जनता दोनों की आवाजों में है।

लेखक: रवि प्रकाश शर्मा
छात्र,काशी विद्यापीठ

(ये लेखक के अपने विचार हैं, खबर तक Media किसी भी तथ्य व विचार के सत्यता की जिम्मेदारी नहीं लेता है। लेख में किए गए सभी दावों के लिए लेखक स्वयं ही जवाबदेह हैं।)

Related Articles

Leave a Comment