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कैसा लगता है जब नज़रें हटा लेते हैं नज़रों में रखने वाले, पढ़िए यह भावुक करने वाली पंक्तियाँ

by Khabartakmedia

ललक लगी थी मन में लगन भी था और मैं मगन भी था
जैसे आकाश में उड़ता कोई पतंग गगन चूमने को हो बेकरार
कभी सोचा नहीं कि इस दरिया में दौड़ना नहीं तैरना ही था
जब किनारे लौट आने को मिलने से रहा हो कोई पतवार

जो कहते थे रखेंगे नज़रों में हर पल
कर गए वो भी नज़रबंद पाला बदलकर
छूकर मेरे मन को गुजरे अतीत की वो यादें
याद आती हैं अब भी तो कुछ बहाने लेकर

मोम सा हृदय मेरा उन यादों की गर्माहट से पिघल पड़ता
कि अब तो झूठे दिलासों की थपकियों से दिल नहीं भरता
सुई की चुभती नोक है जो उन यादों की परतों को कुरेदकर
ताज़ा कर देती है धुंधले सपने मेरी पलकों को भेदकर
फिर उठती है इक टीस वीरान मन में
जैसे घायल मृग करता हो चीत्कार वन में

हालातों को शब्दों में बयां करने की क्षमता खो सी गई है
मन की बात मन में ही रखूँ हालत मेरी कुछ ऐसी हो गई है
कहते हो दिल की बात जुबां पर लाऊँ तो बोलो सुनेगा कौन
यह महफ़िल है खुशगवार मौसम की रहने दो मुझे ही मौन

लिखूँ मैं और तुम दरिया में डालो या कूड़े में फेंक दो
कोरे कागज़ पर नीली स्याही से खींची कुछ लकीरें तो मिट जाएंगी
पर मिटाओगे कैसे उन यादों और भावों की लाल स्याही को
जो बहती हैं तुम्हारा एहसास बनकर मेरे हृदय की धमनियों में

  • महितोष मिश्र
    (स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार)
    परास्नातक छात्र (अंतिम सेमेस्टर)
    पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
    महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी

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